पहलगाम आतंकी हमले की बरसी: बाइसरण की वादियों में अब भी गूंजती है वो दहशत

First year of the Pahalgam Terror Attack: That Terror Still Echoes in the Valley of Baisaranचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: कभी “मिनी स्विट्ज़रलैंड” कहे जाने वाले बाइसरण घास के मैदान की खूबसूरती आज भी वैसी ही है, लेकिन 22 अप्रैल 2025 की दोपहर ने इस स्वर्ग को हमेशा के लिए बदल दिया। उस दिन की गोलियों की गूंज, चीखें और बिखरे हुए सपने—इन सबकी परछाई आज भी पहलगाम की हवा में महसूस की जा सकती है।

अनंतनाग जिले के पहलगाम से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित यह घास का मैदान, जो घने देवदार के जंगलों से घिरा है, हमेशा से पर्यटकों का पसंदीदा स्थल रहा है। लेकिन 22 अप्रैल को दोपहर करीब 1 बजे से 2:45 बजे के बीच, हथियारबंद आतंकियों ने यहां धावा बोल दिया। बिना किसी चेतावनी के गोलियां चलने लगीं, और कुछ ही मिनटों में यह शांत वादी खून से लाल हो गई।

इस हमले में 26 लोगों की जान चली गई—जिनमें 25 पर्यटक और एक स्थानीय घोड़ा चालक आदिल हुसैन शाह शामिल थे, जिन्होंने साहस दिखाते हुए आतंकियों का सामना करने की कोशिश की।

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं। बताया गया कि हमलावर लोगों से उनका धर्म पूछकर उन्हें निशाना बना रहे थे। खासतौर पर हिंदू पर्यटकों को चुन-चुनकर मारा गया, जबकि एक ईसाई पर्यटक और एक मुस्लिम स्थानीय भी इस हिंसा का शिकार बने।

हमलावर आधुनिक हथियारों—एम4 कार्बाइन और एके-47 राइफलों से लैस थे। वे सैन्य वेशभूषा में थे, जिनमें से एक ने पारंपरिक कश्मीरी फेहरन पहन रखा था। उनके पास संचार उपकरण और कैमरे भी थे, और कुछ रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने घटनास्थल पर सेल्फी तक ली।

हमले के दौरान अफरा-तफरी के बीच एक छुट्टी पर आए सेना अधिकारी ने अदम्य साहस दिखाते हुए 35-40 पर्यटकों को सुरक्षित बाहर निकाला और सेना से संपर्क स्थापित किया। वहीं, अहमदाबाद से आए एक पर्यटक द्वारा ज़िपलाइन करते समय अनजाने में इस घटना का वीडियो भी रिकॉर्ड हो गया, जिसमें दहशत, चीखें और जमीन पर पड़े घायल लोग साफ दिखाई देते हैं।

कुछ बचे हुए लोगों ने बताया कि महिलाओं को इसलिए छोड़ा गया ताकि वे इस भयावह घटना की कहानी दूसरों तक पहुंचा सकें। कई पुरुषों—यहां तक कि नवविवाहित जोड़ों के पति—को उनकी पत्नियों के सामने ही मार दिया गया।

ऑपरेशन महादेव: न्याय की तलाश

हमले के तुरंत बाद भारतीय सुरक्षा बलों ने “ऑपरेशन महादेव” शुरू किया। इसका उद्देश्य आतंकियों को भागने से रोकना और उन्हें पकड़ना था। दाचीगाम और महादेव रिज के घने जंगलों में महीनों तक सर्च ऑपरेशन चलता रहा।

आखिरकार 28 जुलाई 2025 को एक बड़ी सफलता मिली, जब सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस की संयुक्त टीम ने तीन प्रमुख आतंकियों—सुलेमान शाह उर्फ फैज़ल जट्ट, अबू हमजा और यासिर—को हरवन के जंगलों में घेरकर मार गिराया।

ऑपरेशन सिंदूर: सीमाओं के पार जवाब

जहां ऑपरेशन महादेव सीधे जिम्मेदार आतंकियों पर केंद्रित था, वहीं “ऑपरेशन सिंदूर” भारत की व्यापक रणनीतिक प्रतिक्रिया थी। 7 से 10 मई 2025 के बीच चलाए गए इस अभियान में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अन्य क्षेत्रों में स्थित आतंकी ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए गए।

कुल नौ बड़े ठिकानों को निशाना बनाया गया। यह कार्रवाई इस तरह से की गई कि आम नागरिकों को नुकसान न पहुंचे। साथ ही भारत ने कूटनीतिक स्तर पर भी 45 देशों को इस हमले की जानकारी दी और वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ अपनी स्थिति स्पष्ट की।

त्रासदी के बाद: टूटन और हौसला

हमले के तुरंत बाद स्थानीय लोगों ने आगे बढ़कर घायलों की मदद की, उन्हें अस्पताल पहुंचाया और शरण दी। सरकार ने आतंकियों की जानकारी देने वालों के लिए 20 लाख रुपये का इनाम भी घोषित किया।

इस घटना का असर पर्यटन पर भी पड़ा। जम्मू-कश्मीर के करीब 50 पर्यटन स्थलों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया। हालांकि समय के साथ कड़ी सुरक्षा के बीच ये स्थान फिर से खुले, लेकिन डर और सतर्कता अब भी बनी हुई है।

एक साल बाद: जख्म अभी भी ताजा

आज, एक साल बाद, पर्यटक धीरे-धीरे पहलगाम लौट रहे हैं, लेकिन जिन परिवारों ने अपने अपनों को खोया, उनके लिए समय जैसे थम गया है। ऐसी ही एक कहानी है गुलनाज़ अख्तर की, जिनके पति आदिल हुसैन शाह ने पर्यटकों को बचाने की कोशिश में अपनी जान गंवा दी। पहले से ही जिंदगी की मुश्किलों का सामना कर रहीं गुलनाज़ अब अपने मायके में रहकर खुद का गुजारा कर रही हैं।

उनकी आवाज़ में दर्द साफ झलकता है, “बिना जीवनसाथी के जिंदगी अधूरी लगती है… लेकिन मुझे गर्व है कि आदिल ने लोगों की जान बचाते हुए अपनी जान दी।”

पहलगाम की वादियां आज भी खूबसूरत हैं, लेकिन 22 अप्रैल 2025 की यादें उनमें हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी हैं—एक ऐसी कहानी, जिसे समय भी मिटा नहीं पाएगा।

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