परिसीमन बिल पर उदयनिधि स्टालिन ने कहा, DMK हमेशा विरोध करती रही है और आगे भी करेगी
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा परिसीमन बिल को दोबारा लाने के संकेत के बाद तमिलनाडु की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। केंद्र ने इस बिल को महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जोड़कर पेश किया है। इसी बीच डीएमके (DMK) के रुख को लेकर उठ रहे सवालों पर पार्टी नेता उदयनिधि स्टालिन ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी परिसीमन का पहले भी विरोध करती रही है और आगे भी इसका विरोध जारी रखेगी।
उदयनिधि स्टालिन ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा, “डीएमके ने शुरुआत से ही परिसीमन का विरोध किया है। हम भविष्य में भी इसका विरोध करते रहेंगे। यह कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार इसे ऐसे पेश कर रही है जैसे यह पहली बार सामने आया हो।”
इस मुद्दे पर विपक्षी गठबंधन INDIA में भी मतभेद की स्थिति दिखाई दे रही है। खबरों के मुताबिक, डीएमके के नरम रुख की अटकलों से कांग्रेस समेत विपक्ष के कई दलों में बेचैनी बढ़ गई थी। हालांकि उदयनिधि के बयान के बाद पार्टी ने अपना रुख स्पष्ट करने की कोशिश की है।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने भी प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया पर चर्चा के लिए राज्य के सांसदों की बैठक बुलाई है। इससे पहले डीएमके ने बिल को लेकर कोई कड़ा सार्वजनिक रुख नहीं अपनाया था, जिसके कारण विपक्षी दलों में चिंता बढ़ी थी।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी परिसीमन बिल के समर्थकों पर निशाना साधते हुए उन्हें “21वीं सदी के एट्टप्पन” कहा। तमिल राजनीति में एट्टप्पन शब्द का इस्तेमाल अक्सर विश्वासघात करने वाले व्यक्ति के लिए किया जाता है।
इससे पहले अप्रैल में विपक्षी दलों की एकजुटता के कारण संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित नहीं हो सका था। इस बिल में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए लगी रोक हटाने का प्रस्ताव था।
प्रस्तावित परिसीमन विधेयक 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्गठन करने की बात करता है। इसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर करीब 850 किए जाने का प्रस्ताव है। डीएमके ने अपनी मांगों में कहा है कि अगले 25 वर्षों तक परिसीमन का आधार 2011 की जगह 1971 की जनगणना को रखा जाना चाहिए। पार्टी का तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें सीटों के पुनर्वितरण में नुकसान नहीं होना चाहिए।
इसके अलावा डीएमके ने सभी राज्यों में लोकसभा सीटों में समान रूप से 50 प्रतिशत बढ़ोतरी की मांग की है। पार्टी का दावा है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अप्रैल में बिल पेश किए जाने के दौरान इस संबंध में मौखिक आश्वासन दिया था। डीएमके की एक अन्य मांग है कि परिसीमन के बाद हर राज्य को मिलने वाली लोकसभा सीटों की संख्या की स्पष्ट सूची भी विधेयक में शामिल की जाए। परिसीमन का मुद्दा अब सिर्फ चुनावी गणित तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि दक्षिण और उत्तर भारत के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बड़ी बहस का केंद्र बन गया है।
