गलवान के 6 साल बाद मोदी-शी जिनपिंग मुलाकात: क्या भारत-चीन रिश्तों में खुलेगा नया अध्याय?

Modi-Xi Jinping meeting six years after Galwan: Will a new chapter open in India-China relations?
( FIle Photo)

चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: भारत और चीन के रिश्तों में करीब छह साल बाद एक अहम राजनीतिक मोड़ आने के संकेत हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 12 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय मुलाकात प्रस्तावित है। अगर यह बैठक होती है, तो 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली औपचारिक आमने-सामने द्विपक्षीय वार्ता होगी।

यह मुलाकात महज एक कूटनीतिक बैठक नहीं होगी, बल्कि इसे भारत-चीन संबंधों में ‘सावधान सुधार’ (cautious thaw) के अगले चरण के तौर पर देखा जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं होगा कि सीमा विवाद खत्म होने की दिशा में कोई बड़ा समझौता तत्काल होने जा रहा है। असली सवाल यह है कि क्या दोनों देश तनाव को नियंत्रित रखने के साथ-साथ रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

गलवान के बाद रिश्ते कितने बदले?

जून 2020 का गलवान संघर्ष भारत-चीन संबंधों के लिए निर्णायक मोड़ था। पूर्वी लद्दाख में हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक मारे गए। चीन ने बाद में अपने चार सैनिकों की मौत स्वीकार की। इसके बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर लंबे समय तक सैन्य गतिरोध बना रहा। हजारों सैनिकों की तैनाती, भारी हथियारों की मौजूदगी और कई दौर की सैन्य-कूटनीतिक बातचीत ने दोनों देशों के रिश्तों को गंभीर तनाव में रखा।

हाल के वर्षों में कई घर्षण बिंदुओं से सैनिकों की वापसी और तनाव कम करने की प्रक्रिया ने हालात को कुछ स्थिर किया है। लेकिन सीमा पर तनाव कम होना और सीमा विवाद का समाधान होना, दो अलग बातें हैं। यही मोदी-शी बैठक की सबसे बड़ी चुनौती भी होगी।

शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की चीन यात्रा और उच्चस्तरीय वार्ताओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके अलावा भारत-चीन सीमा मामलों पर Working Mechanism for Consultation and Coordination (WMCC) की बैठक तथा सीमा प्रश्न पर दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की बातचीत भी हुई है।

इन घटनाओं से संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष केवल शीर्ष नेताओं की बैठक पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि उसके लिए कूटनीतिक और सुरक्षा स्तर पर जमीन तैयार की जा रही है।

अरुणाचल प्रदेश: सबसे कठिन मुद्दों में से एक

पूर्वी लद्दाख में तनाव कम होने के बावजूद भारत-चीन सीमा विवाद का समाधान अभी दूर है। अरुणाचल प्रदेश इस विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा बना हुआ है। चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है और उसे ‘जंगनान’ या दक्षिणी तिब्बत कहता है। भारत इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है और अरुणाचल प्रदेश को देश का अभिन्न हिस्सा मानता है।

चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के लिए अलग-अलग नाम जारी करना भी दोनों देशों के बीच विवाद का विषय रहा है। भारत का स्पष्ट रुख है कि किसी स्थान का नाम बदलने से उसकी संप्रभुता या कानूनी स्थिति नहीं बदलती। ऐसे में मोदी-शी वार्ता में सीमा विवाद पर चर्चा संभव है, लेकिन किसी बड़े समाधान की उम्मीद रखना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

भारत के लिए असली लक्ष्य क्या होगा?

भारत के सामने दो समानांतर लक्ष्य हैं—सीमा पर शांति और व्यापक रणनीतिक हित। नई दिल्ली यह सुनिश्चित करना चाहेगी कि LAC पर फिर से 2020 जैसी स्थिति न बने। इसके साथ ही भारत चीन के साथ व्यापार, निवेश, लोगों के बीच संपर्क और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग के रास्ते भी खुले रखना चाहता है।

भारत का लगातार यह रुख रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक द्विपक्षीय संबंधों के विकास की बुनियादी शर्त है। इसलिए आर्थिक रिश्तों में सुधार की गति भी सीमा पर स्थिति से जुड़ी रहेगी।

चीन के लिए भी मुलाकात क्यों महत्वपूर्ण?

बीजिंग के लिए भारत के साथ रिश्तों में स्थिरता कई कारणों से महत्वपूर्ण है। भारत BRICS, SCO और अन्य बहुपक्षीय मंचों में चीन का एक महत्वपूर्ण साझेदार है। ऐसे समय में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति तेजी से बदल रही है, चीन भारत के साथ लंबे समय तक चलने वाले सीमा तनाव को शायद और बढ़ाना नहीं चाहेगा।

इसके अलावा अमेरिका के साथ चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के साथ स्थिर संबंध बीजिंग के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।

ट्रंप फैक्टर और बदलता वैश्विक समीकरण

मोदी-शी बैठक ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक भू-राजनीति पहले से कहीं ज्यादा अस्थिर है। अमेरिका की टैरिफ नीतियां, चीन-अमेरिका रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव भारत और चीन दोनों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

यही वजह है कि दोनों देशों के लिए कुछ क्षेत्रों में सहयोग और कुछ क्षेत्रों में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, दोनों को एक साथ संभालना जरूरी हो गया है। भारत के लिए चीन के साथ रिश्तों का मतलब अमेरिका से दूरी बनाना नहीं है। इसी तरह चीन के लिए भारत के साथ संवाद का मतलब पश्चिम के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा खत्म करना नहीं है। यह दोनों देशों की ‘multi-alignment’ और रणनीतिक स्वायत्तता की राजनीति का हिस्सा हो सकता है।

क्या यह ‘रीसेट’ होगा?

मोदी-शी की बैठक को भारत-चीन संबंधों का पूर्ण ‘रीसेट’ कहना अभी उचित नहीं होगा।

ज्यादा सही शब्द होगा—’मैनेज्ड स्टेबिलाइजेशन’ यानी नियंत्रित स्थिरीकरण।

दोनों देश फिलहाल तीन स्तरों पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं:

  • सीमा पर सैन्य तनाव को दोबारा बढ़ने से रोकना।
  • राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद को सामान्य करना।
  • जहां दोनों देशों के हित मिलते हैं, वहां आर्थिक और बहुपक्षीय सहयोग बढ़ाना।

लेकिन इसके समानांतर सीमा विवाद, अरुणाचल प्रदेश, रणनीतिक अविश्वास और व्यापार असंतुलन जैसे मुद्दे बने रहेंगे।

सबसे बड़ा सवाल: क्या भरोसा लौटेगा?

मोदी-शी मुलाकात की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि दोनों नेता कितनी देर बातचीत करते हैं या संयुक्त बयान में कितने सकारात्मक शब्द आते हैं।असल कसौटी यह होगी कि क्या बातचीत के बाद LAC पर स्थिरता और मजबूत होती है? क्या सैन्य और कूटनीतिक संवाद नियमित रहता है? क्या व्यापारिक रिश्तों में व्यावहारिक सुधार आता है? और क्या दोनों देश एक-दूसरे के रणनीतिक हितों को लेकर अधिक स्पष्ट समझ विकसित कर पाते हैं?

2020 के बाद भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ी कमी भरोसे की रही है। इस भरोसे को वापस बनाने में एक बैठक पर्याप्त नहीं होगी। फिर भी, अगर 12 सितंबर को मोदी और शी जिनपिंग आमने-सामने बैठते हैं, तो यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण संदेश होगा—गलवान के बाद भारत और चीन अब टकराव से आगे बढ़कर नियंत्रित संवाद की ओर लौटने की कोशिश कर रहे हैं। यह शुरुआत कितनी दूर तक जाएगी, इसका जवाब सीमा पर शांति, कूटनीतिक निरंतरता और आने वाले महीनों में दोनों देशों के व्यवहार से मिलेगा।

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