BRICS पर कांग्रेस में दो राय: चिदंबरम ने पूछे फायदे, थरूर ने गिनाई भारत की कूटनीतिक ताकत

Divergent views within Congress on BRICS: Chidambaram questions the benefits, Tharoor highlights India's diplomatic strength.चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: BRICS के मुद्दे पर कांग्रेस के दो बड़े नेता आमने-सामने आ गए हैं। एक ने BRICS की बैठकों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि भारत को आखिर इससे क्या मिलेगा? तो दूसरे ने इसी मंच को भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत और ग्लोबल साउथ में उसकी भूमिका का अहम जरिया बताया।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने हाल ही में BRICS के पिछले दो-तीन सम्मेलनों से भारत को मिले ‘ठोस फायदे’ पर सवाल उठाया था। उनका कहना था कि भारत कई बहुपक्षीय मंचों, BRICS, SCO, G20 और QUAD, का हिस्सा है, लेकिन इन बैठकों से देश को वास्तविक और ठोस नतीजे क्या मिले, यह स्पष्ट नहीं है।

चिदंबरम के इस बयान के अगले ही दिन कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने BRICS का दूसरा पक्ष सामने रखा। उन्होंने कहा कि BRICS ग्लोबल साउथ के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है और इसकी मेजबानी भारत की ‘डिप्लोमैटिक कन्वीनिंग पावर’ यानी अलग-अलग देशों को एक मंच पर लाने की क्षमता को दिखाती है।

थरूर ने क्यों बताया BRICS को अहम?

शशि थरूर के मुताबिक BRICS में ग्लोबल साउथ के 11 प्रमुख देश शामिल हैं, जो दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक GDP के करीब 41 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

उनका तर्क है कि यह कोई छोटा या प्रतीकात्मक समूह नहीं है। ऐसे समय में जब वैश्विक व्यवस्था तेजी से बदल रही है और विकासशील देश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं, BRICS भारत को अपनी बात रखने के लिए एक बड़ा मंच देता है।

थरूर ने दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी को भारत के लिए प्रतिष्ठा का विषय भी बताया। उनके मुताबिक एक दर्जन के करीब राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों का भारत आना यह दिखाता है कि नई दिल्ली अलग-अलग शक्तियों को एक मंच पर ला सकती है।

यानी जहां चिदंबरम BRICS से निकलने वाले ठोस परिणाम पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं थरूर इसकी कूटनीतिक उपयोगिता और वैश्विक प्रभाव को महत्व दे रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि थरूर ने BRICS का बचाव करते हुए भी इसकी कमजोरियों को छिपाया नहीं। उन्होंने कहा कि संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग देशों के हितों और विचारों के बीच सहमति बनाना है। BRICS में शामिल देशों की विदेश नीति, सुरक्षा प्राथमिकताएं और दूसरे देशों के साथ रिश्ते एक जैसे नहीं हैं। इसका असर हाल की बैठकों में भी देखने को मिला।

मई में नई दिल्ली में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान ईरान युद्ध और रूस-यूक्रेन संघर्ष जैसे मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी। नतीजा यह हुआ कि साझा घोषणा की जगह भारत की ओर से चेयर का बयान जारी किया गया।

यही वह बिंदु है जहां चिदंबरम का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर BRICS किसी बड़े वैश्विक संकट पर साझा रुख ही नहीं बना पाता, तो फिर उसकी वास्तविक प्रभावशीलता कितनी है? BRICS की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी एक ही है

BRICS की ताकत उसका आकार है, लेकिन यही उसका सबसे बड़ा संकट भी है। समूह में अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और रणनीतिक हितों वाले देश हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। चीन और अमेरिका के बीच रणनीतिक टकराव है। रूस पश्चिमी देशों के साथ लंबे संघर्ष में है। मध्य-पूर्व के सदस्य देशों के भी अपने-अपने क्षेत्रीय हित हैं।

ऐसे में सभी देशों को एक ही मुद्दे पर एकमत करना आसान नहीं है। यही वजह है कि BRICS को एक एकजुट सैन्य या राजनीतिक गठबंधन के तौर पर देखना शायद सही नहीं होगा। इसकी उपयोगिता अधिकतर आर्थिक सहयोग, ग्लोबल साउथ की आवाज, वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था और बहुपक्षीय कूटनीति में दिखाई देती है।

भारत के लिए असली सवाल: फायदा कितना?

BRICS की उपयोगिता पर बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत का अपना आर्थिक हित है। थरूर ने खुद माना कि BRICS देशों के साथ भारत का व्यापार बढ़ा है, लेकिन यह वृद्धि हर लिहाज से भारत के पक्ष में नहीं रही। भारत के निर्यात में कमी आई है, जबकि BRICS देशों से आयात बढ़ा है।

यानी BRICS के भीतर व्यापार बढ़ना अपने आप में भारत के लिए सफलता नहीं माना जा सकता।

भारत के लिए असली सवाल है; क्या BRICS ऐसा आर्थिक माहौल बना सकता है जिसमें भारतीय कंपनियों के लिए बाजार खुले, निर्यात बढ़े और व्यापार असंतुलन कम हो? अगर इसका जवाब हां है तो BRICS भारत के लिए व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है। अगर व्यापार केवल आयात बढ़ाने का माध्यम बनता है, तो चिदंबरम का सवाल और ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है।

फिर भारत BRICS को इतना महत्व क्यों देता है?

इसका जवाब सिर्फ व्यापार में नहीं, बदलती वैश्विक राजनीति में छिपा है। भारत आज एक साथ कई मंचों पर सक्रिय है। वह QUAD में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ है, G20 में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और BRICS तथा SCO जैसे मंचों पर चीन और रूस के साथ भी बैठता है।

यह विरोधाभास नहीं, बल्कि भारत की बहु-संरेखीय कूटनीति का हिस्सा है। नई दिल्ली किसी एक शक्ति-गुट में पूरी तरह शामिल होने के बजाय अलग-अलग मंचों पर अपने हितों के मुताबिक साझेदारी बनाए रखना चाहती है।

BRICS भारत को पश्चिमी देशों के अलावा रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के दूसरे देशों के साथ संवाद का अवसर देता है। वहीं QUAD और अमेरिका के साथ साझेदारी भारत को हिंद-प्रशांत और सुरक्षा के क्षेत्र में रणनीतिक विकल्प देती है।

कांग्रेस की बहस से बड़ा सवाल

इसलिए चिदंबरम और थरूर के बयानों को सिर्फ कांग्रेस के भीतर मतभेद के रूप में देखना इस बहस को छोटा कर देगा। असल सवाल यह है कि भारत को BRICS से क्या हासिल करना चाहिए?

क्या सिर्फ बड़े नेताओं का भारत आना और वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ना पर्याप्त है? या फिर भारत को व्यापार, निवेश, भुगतान प्रणाली, तकनीक और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे क्षेत्रों में ठोस परिणाम मांगने चाहिए? भारत के लिए चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि दुनिया के बड़े नेता नई दिल्ली में एक साथ जुटें। असली चुनौती यह है कि क्या भारत इस मंच को अपने आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक हितों के लिए ठोस परिणाम में बदल सकता है।

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