सीआर पार्क की 50 साल से ज्यादा पुरानी दुर्गा पूजा की विरासत
दिलीप गुहा
नई दिल्ली, अक्टूबर 2026: दुर्गा पूजा के करीब आते ही दिल्ली-एनसीआर में साल के सबसे प्रतीक्षित त्योहारों में से एक को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। शहर के विभिन्न हिस्सों में पूजा समितियां पंडालों, प्रतिमाओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक आयोजनों को अंतिम रूप देने में जुटी हैं। ये तैयारियां राष्ट्रीय राजधानी में बंगाली संस्कृति की गहरी जड़ों और जीवंत उपस्थिति को दर्शाती हैं।
इनमें चित्तरंजन पार्क (सीआर पार्क) की को-ऑपरेटिव ग्राउंड दुर्गा पूजा समिति का विशेष स्थान है, जो इस वर्ष अपने 51वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। पूजा का आयोजन 15 से 21 अक्टूबर तक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर को-ऑपरेटिव पूजा ग्राउंड, के-ब्लॉक, सीआर पार्क में किया जाएगा।
हालांकि, दिल्ली में दुर्गा पूजा का इतिहास एक सदी से भी अधिक पुराना है। राजधानी में पहली दर्ज सार्वजनिक दुर्गा पूजा (सार्वजनिक पूजा) का आयोजन 1909 में तिमारपुर में हुआ था, हालांकि यह आयोजन कुछ वर्षों तक ही जारी रहा। इसके अगले वर्ष, 1910 में कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई, जो दशकों से लगातार जारी है और दिल्ली-एनसीआर की सबसे पुरानी जीवित दुर्गा पूजा परंपराओं में शामिल है।
1950 और 1960 के दशक में दिल्ली में बंगाली आबादी बढ़ने के साथ ही कई अन्य सामुदायिक पूजाओं की शुरुआत हुई। इनमें नई दिल्ली कालीबाड़ी, माता सुंदरी रोड और करोल बाग की पूजाएं प्रमुख थीं। इन आयोजनों ने दुर्गा पूजा को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे दिल्ली में बंगाली समुदाय के सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति बना दिया।
इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण अध्याय चित्तरंजन पार्क, जिसे उस समय ईपीडीपी कॉलोनी के नाम से जाना जाता था, की स्थापना के साथ शुरू हुआ। बंगाली परिवारों के लिए विकसित इस क्षेत्र में 1970 के दशक तक दुर्गा पूजा सामुदायिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी।
को-ऑपरेटिव दुर्गा पूजा समिति की औपचारिक स्थापना 1976 में हुई और इसके साथ पूजा का स्वरूप धीरे-धीरे व्यापक होता गया। एक महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब समिति ने मेगा पंडाल की अवधारणा को अपनाया और पंडाल के रूप में कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल की प्रतिकृति तैयार की। इस पहल ने सीआर पार्क को दिल्ली की सबसे प्रमुख दुर्गा पूजा स्थलों में स्थापित कर दिया। इसके बाद के वर्षों में भी देश और दुनिया की प्रसिद्ध स्थापत्य एवं सांस्कृतिक धरोहरों से प्रेरित प्रतिकृतियां और कलात्मक प्रस्तुतियां देखने को मिलीं।
समय के साथ सीआर पार्क की को-ऑपरेटिव पूजा को अपनी विषय-वस्तु, शिल्पकला और प्रस्तुति के लिए अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले हैं। एक सामुदायिक आयोजन से शुरू हुई यह पूजा आज दिल्ली-एनसीआर के प्रमुख सांस्कृतिक आकर्षणों में शामिल है और यहां राजधानी के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
समिति के अध्यक्ष कौशिक चट्टोपाध्याय ने कहा, “अपने 51वें वर्ष में जूट और बांस पर आधारित थीम के साथ आगे बढ़ना बिल्कुल उपयुक्त लगता है, क्योंकि ये वे सामग्रियां हैं जिनके साथ हमारे पूर्वज काम करते थे। मेरी उम्मीद है कि हर आगंतुक यहां से कारीगरों और उन प्राकृतिक सामग्रियों के प्रति थोड़ा अधिक सम्मान लेकर जाए, जिन्होंने इस कला को आकार दिया है।”
समिति के सचिव सौरव चक्रवर्ती ने बताया कि तैयारियों में काफी धैर्य और कुशलता की आवश्यकता पड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पूजा केवल सीआर पार्क के निवासियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी के लिए है। आनंद मेला, सांस्कृतिक संध्याएं और सिंदूर खेला जैसे कार्यक्रम इस उत्सव को और व्यापक बनाएंगे।
हर वर्ष अनुमानित छह लाख आगंतुकों (Visitors) को आकर्षित करने वाली को-ऑपरेटिव ग्राउंड पूजा अब दिल्ली के प्रमुख उत्सवी आयोजनों में शामिल हो चुकी है। इसका सफर तिमारपुर और कश्मीरी गेट जैसे इलाकों में शुरू हुई शुरुआती सामुदायिक पूजाओं से लेकर सीआर पार्क के भव्य मेगा पंडालों तक पहुंचा है और यह दिल्ली-एनसीआर में दुर्गा पूजा की व्यापक यात्रा को दर्शाता है।
बंगाली परिवारों की कई पीढ़ियों और हर वर्ष इन आयोजनों का हिस्सा बनने वाले हजारों लोगों के लिए दिल्ली की दुर्गा पूजा अब केवल एक त्योहार नहीं रह गई है। यह आस्था, शिल्पकला, सामुदायिक भावना और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बंगाल की जीवंत सांस्कृतिक पहचान की निरंतर अभिव्यक्ति बन चुकी है।
