सम्राट हेमू के विजयोत्सव पर रौनियार वैश्य सभा ने उठाईं तीन प्रमुख मांगें
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली:रौनियार वैश्य सभा, दिल्ली की ओर से हिमाचल भवन में सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य हेमू का विजयोत्सव आयोजित किया गया। समारोह के दौरान सभा ने सम्राट हेमू की स्मृति और उनके ऐतिहासिक योगदान को उचित सम्मान दिलाने के लिए तीन प्रमुख मांगें उठाईं। इनमें बिहार के सासाराम में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित करना, उनके जीवन एवं योगदान को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में उचित स्थान देना तथा दिल्ली के अकबर रोड का नाम बदलकर सम्राट विक्रमादित्य हेमचंद्र के नाम पर करने की मांग शामिल है।
रौनियार वैश्य सभा, दिल्ली के राष्ट्रीय संयोजक एवं मीडिया प्रभारी पंकज कुमार ने बताया कि सभा के अध्यक्ष सुबोध प्रसाद पंकज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र एवं ई-मेल के माध्यम से सम्राट हेमू के स्मरण और उल्लेख के लिए आभार व्यक्त करते हुए सासाराम में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित करने सहित अन्य मांगें रखी हैं। सभा के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से पत्र प्राप्त होने की सूचना भी दी गई है। इस अवसर पर सभा के पूर्व अध्यक्ष सुबोध कुमार गुप्ता द्वारा लिखित शोध ग्रंथ आखिर कौन था हेमू’ का भी उल्लेख किया गया।
सभा की तीन प्रमुख मांगों में सासाराम में सम्राट हेमू की आदमकद प्रतिमा स्थापित करना, उनके जीवन एवं ऐतिहासिक योगदान को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल करना तथा दिल्ली के अकबर रोड का नाम बदलकर सम्राट विक्रमादित्य हेमचंद्र के नाम पर करना शामिल है। सभा की इच्छा है कि सासाराम में प्रस्तावित प्रतिमा का अनावरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया जाए।
समारोह के मुख्य अतिथि एवं पूर्व राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी ने कहा कि सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य जैसे महान योद्धा का होना पूरे समाज और राष्ट्र के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि हेमू ने बेहद साधारण और सामान्य पृष्ठभूमि से शुरुआत कर अपने पराक्रम और प्रतिभा के बल पर सम्राट के सर्वोच्च पद तक का सफर तय किया।
प्रो. मुखी ने पानीपत की दूसरी लड़ाई का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि सम्राट हेमू उस युद्ध में पराजित न होते और उनके अभियान को सफलता मिलती, तो भारत के इतिहास की दिशा अलग हो सकती थी। उन्होंने कहा कि सम्राट हेमू का जीवन भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे लंबे समय तक अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य का उल्लेख करते हुए प्रो. मुखी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ कार्यक्रम में सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य का उल्लेख किए जाने के बाद इस विषय को लेकर देश में नई जागरूकता पैदा हुई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अब शोधकर्ता सम्राट हेमू के जीवन और योगदान पर व्यापक एवं तथ्यपरक शोध करेंगे, जिससे इस विस्मृत योद्धा को इतिहास में उनका उचित और न्यायसंगत सम्मान मिल सकेगा।
प्रख्यात लेखक डॉ. अतुल सिंघलने कहा कि मुख्यधारा के इतिहास लेखन में असम के वीर लचित बरफुकन सहित अनेक राष्ट्रनायकों के योगदान को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य भी ऐसे ही महान व्यक्तित्वों में शामिल हैं, जिनके योगदान को व्यापक स्तर पर सामने लाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार देश के भूले-बिसरे योद्धाओं और राष्ट्रनायकों की गौरवगाथाओं को सामने लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।
सम्राट हेमू से जुड़ी सभी मांगों का समर्थन करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. जगदीश मुखी ने आयोजकों को आश्वस्त किया कि वे इन प्रस्तावों और मांगों को उचित एवं प्रभावी स्तर पर सरकार के समक्ष उठाएंगे।
सभा के राष्ट्रीय संयोजक एवं मीडिया प्रभारी पंकज कुमार ने कहा कि ऐतिहासिक मान्यताओं और विभिन्न शोधों के अनुसार सम्राट हेमू का संबंध रौनियार वैश्य समाज से रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 30 अगस्त को प्रसारित ‘मन की बात’ के 137वें एपिसोड में सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य का उल्लेख किए जाने पर उनका आभार व्यक्त किया।
समारोह में दिल्ली-एनसीआर के कई वरिष्ठ संपादक, ब्यूरो प्रमुख एवं मीडिया प्रतिनिधियों के साथ रौनियार वैश्य समाज के प्रबुद्ध नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। उपस्थित लोगों ने सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य की विरासत और योगदान को संरक्षित करने तथा उन्हें इतिहास में उचित सम्मान दिलाने की पहल की सराहना की।
