जिमखाना के बाद अब दिल्ली गोल्फ क्लब पर सवाल, क्या जनता की जमीन पर सिर्फ रसूखदारों का हक?

After the Gymkhana, the Delhi Golf Club now faces scrutiny: Do only the influential have a claim to public land?
(Pic credit: Delhi Golf Club)

चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: क्या देश की राजधानी के सबसे कीमती सार्वजनिक भूभाग पर बने ऐसे एलीट क्लबों की आज भी जरूरत है, जहां आम आदमी की पहुंच लगभग नामुमकिन हो? जहां सदस्यता पीढ़ियों तक विरासत की तरह हस्तांतरित होती हो, जहां सरकारी जमीन पर कुछ हजार लोग दशकों से विशेषाधिकारों का आनंद लेते हों और जहां खेल के नाम पर बने संस्थान खुद खिलाड़ियों के लिए ही बंद दरवाजे बन जाएं?

दिल्ली जिमखाना क्लब को लेकर शुरू हुई बहस अब राजधानी के एक और बड़े और कहीं ज्यादा प्रभावशाली संस्थान, दिल्ली गोल्फ क्लब, तक पहुंच चुकी है। लुटियंस दिल्ली के दिल में फैला यह क्लब केवल एक खेल संस्था नहीं, बल्कि सत्ता, रसूख, नौकरशाही और सामाजिक विशेषाधिकार का प्रतीक बन चुका है।

दिल्ली जिमखाना क्लब से शुरू हुई बहस

दिल्ली जिमखाना क्लब तब सुर्खियों में आया जब केंद्र सरकार ने क्लब को 5 जून तक परिसर खाली करने का नोटिस दिया। सफदरजंग रोड स्थित 27.3 एकड़ की प्राइम सरकारी जमीन पर बने इस क्लब से रक्षा और सुरक्षा ढांचे के लिए जमीन वापस लेने की तैयारी की जा रही है।

बहस इसलिए भी तेज हुई क्योंकि क्लब इतने बड़े भूभाग के लिए मात्र लगभग एक हजार रुपये मासिक किराया चुका रहा था, जबकि इसकी सदस्यता बेहद सीमित और प्रभावशाली लोगों तक सिमटी हुई थी। लेकिन जिमखाना से कुछ किलोमीटर दूर स्थित दिल्ली गोल्फ क्लब का मामला इससे कहीं बड़ा है। यह क्लब करीब 179 एकड़ सरकारी जमीन पर फैला है, यानी जिमखाना से लगभग आठ गुना ज्यादा।

राजधानी की सबसे महंगी जमीन पर एलीट दुनिया

डॉ. जाकिर हुसैन रोड पर स्थित दिल्ली गोल्फ क्लब इंडिया गेट, हुमायूं का मकबरा और लोधी गार्डन जैसे ऐतिहासिक स्थलों के बेहद करीब है। क्लब परिसर के भीतर कई संरक्षित मध्यकालीन स्मारक भी मौजूद हैं, जिनमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित धरोहरें भी शामिल हैं।

ब्रिटिश काल में 1930 के दशक में एक नगरपालिका गोल्फ कोर्स के रूप में शुरू हुआ यह संस्थान 1950 में कॉरपोरेट इकाई बना और धीरे-धीरे देश की नौकरशाही, राजनीति, सेना, न्यायपालिका और कारोबारी वर्ग का सबसे शक्तिशाली नेटवर्किंग केंद्र बन गया।

आज क्लब के करीब 4,000 सदस्य हैं, जिनमें वरिष्ठ नौकरशाह, जज, राजनेता, राजनयिक, सैन्य अधिकारी और बड़े उद्योगपति शामिल हैं।

दशकों लंबा इंतजार, विरासत की सदस्यता

दिल्ली गोल्फ क्लब की सदस्यता व्यवस्था लंबे समय से विवादों में रही है। बताया जाता है कि क्लब हर साल केवल 60 से 70 स्थायी सदस्य ही जोड़ता है। आम नागरिकों और पेशेवरों के लिए “बिजनेस कैटेगरी” में आवेदन करने वालों को सदस्यता के लिए दशकों इंतजार करना पड़ता है। कई आवेदन तो 1970 के दशक से लंबित बताए जाते हैं।

इसके उलट, मौजूदा सदस्यों के बच्चों और परिजनों को विशेष कोटा और प्राथमिकता मिलती है। आलोचकों का कहना है कि यह व्यवस्था क्लब को खेल संस्था से ज्यादा “वंशानुगत एलीट सर्कल” में बदल देती है।

दिल्ली हाईकोर्ट भी इन सदस्यता नियमों पर सवाल उठा चुका है। 2023 में प्रेम नाथ वशिष्ठ मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पूछा था कि क्या परिजनों के लिए सीटें आरक्षित करने से खेल में व्यापक भागीदारी बाधित नहीं हो रही?

आम आदमी की पहुंच से बाहर

क्लब की सदस्यता फीस भी बेहद ऊंची है। बिजनेस कैटेगरी के भारतीय सदस्यों के लिए शुल्क लगभग 15 लाख रुपये तक बताया जाता है। सरकारी अधिकारियों के लिए यह करीब 4.5 लाख रुपये और आश्रित सदस्यों के लिए लगभग 3.5 लाख रुपये है।

इसके अलावा वार्षिक शुल्क, सिक्योरिटी डिपॉजिट और उपयोग शुल्क अलग से हैं। यहां तक कि गैर-सदस्य गोल्फ खिलाड़ियों को भी एक राउंड खेलने के लिए हजारों रुपये चुकाने पड़ते हैं।

आलोचकों का सवाल है कि सार्वजनिक जमीन पर बने संस्थान आखिर इतने विशिष्ट और आम नागरिकों से कटे हुए क्यों हैं?

46 हजार करोड़ की जमीन, मामूली किराया

दिल्ली गोल्फ क्लब जिस सरकारी जमीन पर बना है, उसका लीज समझौता 2050 तक बढ़ाया जा चुका है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, 2013 में इस जमीन की अनुमानित कीमत करीब 46,722 करोड़ रुपये आंकी गई थी, जो आज कहीं ज्यादा हो सकती है। इसके बावजूद क्लब द्वारा सरकार को चुकाया जाने वाला किराया बेहद कम बताया जाता है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2012 से अब तक केंद्र सरकार को दिल्ली गोल्फ क्लब से कुल लगभग 15.54 करोड़ रुपये ग्राउंड रेंट और अन्य शुल्क के रूप में मिले हैं। यानी राजधानी की सबसे महंगी जमीन पर बने इस विशाल परिसर के लिए मासिक किराया लगभग 9 लाख रुपये बैठता है।

यही वजह है कि आलोचक इसे सरकारी संरक्षण में चल रही “लक्जरी एन्क्लेव संस्कृति” बताते हैं।

खेल के नाम पर खिलाड़ियों की एंट्री बंद?

सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिस क्लब को गोल्फ को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जमीन दी गई थी, वहीं पेशेवर खिलाड़ियों को अभ्यास तक की अनुमति नहीं मिलने के आरोप लगे।

मई 2025 में दो बार एशियन टूर जीत चुके राशिद खान समेत कई स्थानीय गोल्फ खिलाड़ियों और कैडी-प्रोफेशनल्स ने जंतर-मंतर पर धरना दिया। खिलाड़ियों का आरोप था कि 2012 के बाद से क्लब ने कैडी-प्रोफेशनल्स के अभ्यास पर रोक लगा दी और 2019 के बाद नियम और सख्त हो गए।

खिलाड़ियों ने दावा किया कि इससे कई करियर बर्बाद हुए, कुछ खिलाड़ियों को दूसरे शहरों में जाना पड़ा और कई ने पेशेवर गोल्फ छोड़ने तक का विचार किया। राशिद खान ने आरोप लगाया कि सरकार के 2020 के निर्देश के बावजूद दिल्ली के पेशेवर खिलाड़ियों को सदस्यता या अभ्यास की सुविधा नहीं दी गई।

हालांकि क्लब का कहना है कि वह एक निजी सदस्यीय संस्था है और खेलने की अनुमति उसके आंतरिक नियमों के अनुसार दी जाती है। मामला फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है।

नस्लभेद के आरोपों से भी घिरा क्लब

2017 में क्लब राष्ट्रीय विवाद के केंद्र में आ गया था, जब मेघालय की एक खासी महिला ने आरोप लगाया कि पारंपरिक “जैन्सेम” पोशाक पहनने पर उन्हें क्लब से बाहर जाने को कहा गया। कथित तौर पर स्टाफ ने उनकी पोशाक को “नौकरानी की यूनिफॉर्म” जैसा बताया था।

इस घटना ने पूरे पूर्वोत्तर में आक्रोश पैदा कर दिया। राजनीतिक नेताओं, सामाजिक संगठनों और महिला आयोगों ने इसे नस्लभेद, सांस्कृतिक असंवेदनशीलता और वर्गभेद का उदाहरण बताया।

क्या बदलने का समय आ गया है?

दिल्ली जिमखाना क्लब पर कार्रवाई के बाद अब दिल्ली गोल्फ क्लब भी बहस के केंद्र में है। सवाल केवल जमीन या किराये का नहीं, बल्कि उस सोच का है जिसमें सार्वजनिक संसाधनों पर कुछ हजार विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का लगभग स्थायी कब्जा बना रहता है।

क्या राजधानी के इतने बड़े हरित क्षेत्र और सार्वजनिक जमीन को केवल चुनिंदा लोगों के मनोरंजन तक सीमित रखा जाना चाहिए? या फिर इन्हें आम नागरिकों, खिलाड़ियों, सांस्कृतिक गतिविधियों और सार्वजनिक उपयोग के लिए नए सिरे से विकसित किया जाना चाहिए?

दिल्ली गोल्फ क्लब पर उठ रहे सवाल अब केवल एक क्लब की कहानी नहीं रह गए हैं, बल्कि वे भारत में एलीट संस्कृति, सार्वजनिक संसाधनों और सामाजिक समानता पर एक बड़ी बहस का रूप ले चुके हैं।

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