लूट और झूठ से निकल कर नयी शुरुआत करे बॉडी बिल्डिंग!

राजेंद्र सजवान

डाक्टर, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ कह रहे हैं कि कोरोना के चलते और वैक्सीन आने के बाद भी तमाम खेलों के लिए पहले से माहौल में खेल जारी रख पाना आसान नहीं होगा। ख़ासकर बॉडी कान्टेक्ट वाले खेल अधर में लटक सकते हैं। मसलन, कुश्ती, मुक्केबाज़ी, फुटबाल, हॉकी, बास्केटबाल, वॉलीबाल और अन्य टीम खेलों के लिए ख़तरे की घंटी बज गई है। लेकिन कुछ खेल हैं, जोकि थोड़ी सी सावधानी और सुरक्षा का ध्यान रखते हुए धमाके के साथ शुरुआत कर सकते हैं। इनमें बॉडी बिल्डिंग चाहे तो पहल कर सकती है, क्योंकि सरकारों ने जिम और हैल्थ क्लबों को काफ़ी हद तक राहत देने का मन बना लिया है और देर सबेर हरी झंडी मिल सकती है। सोशल डिस्टेनसिंग, सेनेटाईजिंग और नियमों में थोड़ा बदलाव कर बॉडी बिल्डिंग मुकाबलों को आयोजित किया जा सकता है।

पूरी तरह ना सही कुछ हद तक देश और दुनिया में बॉडी बिल्डिंग जैसे खूबसूरत खेल के लिए माहौल बनाने और बाजी मारने का अवसर है। लेकिन सावधान! ऐसे नहीं चलेगा जैसे अब तक चलाते आ रहे हैं। सबसे पहले भारतीय बॉडी बिल्डिंग के कर्ता-धर्ताओं को यह कसम खानी पड़ेगी कि अपने खेल के साथ ईमानदारी से पेश आएँगे। वही व्यवस्था लागू करनी पड़ेगी जिसने देश को मोंतोष राय, मनोहरआइच और प्रेम चन्द डेगरा जैसे मिस्टर यूनिवर्स और महान चैम्पियन दिए।

आख़िर क्यों भारत 1988 के बाद कोई मिस्टर यूनिवर्स पैदा नहीं कर पाया? क्यों हमारे बॉडी बिल्डिंग के कर्णधार हर साल अनेक फ़र्ज़ी वर्ल्ड और कामनवेल्थ चैम्पियन पैदा कर रहे है?

भारत में फूड सपलिमेंट के नाम पर डोप, ज़हर और कूड़ा करकट बेचने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि यहाँ किसकी तरफ उंगली उठाई जा रही है! यह ना भूलें कि मानव और मानवता ख़तरे में है। जो कल तक खुद को खुदा समझते थे, अपने जीवन की खैर मना रहे हैं। बेहतर होगा कि खेल से खिलवाड़ करने वाले जब कोरोना से निपटने के बाद  नये सिरे से देह बनाने के व्यापार में उतरेंगे तो उनकी सोच बदली होगी और अपने खेल को देह व्यापार जैसी कालिख से दूर रखेंगे।

पिछले बीस-तीस सालों में शरीर सौष्ठव जैसा पवित्र खेल वेश्यावृति की तरह फैल तो गया लेकिन इस खेल के भारतीय ठेकेदारों ने मोटी कमाई के फेर में खेल की आत्मा पर पानी फेर दिया। रातों रात बॉडीबनाने वाले लाखों खर्च करने के लिए विवश हुए, जिनमें से ज़्यादातर बीमार शरीर बन गए या कुछ एक अकाल मौत भी मरे।

लाखों लेकर फर्जी सर्टिफिकेट देना, विदेश दौरे कराना और चैम्पियन का गीदड़ पट्टा देना भारतीय बॉडी बिल्डिंग का चरित्र  बन चुका है। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर गुटबाजी आम है। खेल बिगड़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि कई सालों से विश्व और राष्ट्रीय स्तर पर बॉडी बिल्डिंग के कई खैर ख्वाह अपनी अपनी दुकानें सज़ा कर बैठे हैं और लूट का खेल जोरों पर है। अफ़सोस की बात यह है कि कई बड़े नाम भी इस गोरखधंधे में शामिल हैं और चूँकि उनका फरजीवाड़ा ज़ोर शोर से चल रहा है, इसलिए सुधार चाहते ही नहीं।

खेल से जुड़े कई पूर्व खिलाड़ियों और ट्रेनरों से जब बॉडी बिल्डिंग में सुधार  के बारे में बात की गई तो सभी ने माना कि एक बैनर के नीचे बेहतर काम हो सकता है,यदि अवसरवादी मान गए तो! वरना जिस खेल को कोरोना ने सबसे पहले  सुधरने का मौका दिया है उसको भविष्य में कोई नहीं बचा पाएगा।

(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार और विश्लेषक हैं। ये उनका निजी विचार हैचिरौरी न्यूज का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।आप राजेंद्र सजवान जी के लेखों को  www.sajwansports.com पर  पढ़ सकते हैं।)

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