कब-कब झेला गया है दुनिया में महामारी का प्रकोप

शिवानी राजवारिया

नई दिल्ली: अंग्रेजी में महामारी के लिए दो अलग-अलग शब्द होते हैं। एक होता है एपिडेमिक (epidemic) यानी वो बीमारी जो किसी एक इलाके या देश में तेज़ी से फैले। लेकिन जैसे ही कोई बीमारी देश की सीमाओं से निकलकर कई देशों में फैलने लगती है तो उसे पैनडेमिक (pandemic) कहा जाता है।

ये पहली बार नहीं है कि किसी बीमारी को महामारी घोषित किया गया हो। इससे पहले साल 2009 में स्वाइन फ्लू को महामारी घोषित किया गया था तब पूरी दुनिया में दो लाख से ज्यादा लोग स्वाइन फ्लू से मारे गए थे।
साल 2014-15 में पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला को एपिडेमिक घोषित किया गया क्योंकि ये बीमारी इसकी सीमाओं से लगते कुछ चुनिंदा देशों में ही फैली थी। जब किसी बीमारी को महामारी घोषित कर दिया जाता है तो इसका मतलब बीमारी लोगों के बीच आपस में संक्रमण से फैलेगी। सरकार के लिए यह एक तरह का अलर्ट होता है।

कब होती है महामारी की घोषणा?
किसी बीमारी के महामारी होने की घोषणा उसके कारण होने वाली मौतों और पीड़ितों की संख्या पर निर्भर करती है। 2003 में सार्स (SARS) का वायरस सामने आया था। उससे 26 देश प्रभावित हुए थे। इसके बावजूद उसको महामारी घोषित नहीं किया गया था। किसी बीमारी को महामारी घोषित करने का फैसला डब्ल्यूएचओ को लेना होता है।

क्यों पहले ही नहीं की जाती महामारी की घोषणा?

बीमारी को महामारी घोषित करते ही दुनियाभर में डर का माहौल बन जाता है। महामारी घोषित करने के बाद इस बात का खतरा भी होता है कि डर में लोग पलायन करने लगते हैं। ऐसे लोगों के पलायन करने की वजह से संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। 2009 में ‘स्वाइन फ्लू’ को महामारी घोषित करने के बाद ऐसा ही हुआ था।

महामारी होने की अधिक संभावना तब होती है जब वायरस बिल्कुल नया हो।आसानी से लोगों में संक्रमित हो रहा हो और लोगों के बीच संपर्क से फैल रहा हो। कोरोना वायरस इन सभी पैमानों को पूरा करता है।
भारत में इससे पहले भी महामारी के प्रकोप को देखा गया है। आइए जानते हैं…
कॉलरा (हैजा)
भारत में एक ऐसा दौर आया था कि पानी पीने के बाद लोग बीमार पड़ते और फिर  उनकी मौत हो जाती थी। 1940 के दशक में आजादी के लिए लड़ते भारत ने कॉलरा से संघर्ष किया। आम बोलचाल में इसे हैजा कहते हैं। पीने का गंदा पानी इसकी मुख्य वजह थी। कुएं और तालाब के पानी में क्लोरीन मिलाई जाती थी, लेकिन यह उपाय उतना कारगर नहीं था।

फैलने की वजह

हैजा वाइब्रियो कॉलेरी नाम के बैक्टीरिया से फैलता है। यह बैक्टीरिया खराब हो चुके खाने और गंदे पानी में होता है।इसमें दस्त और उल्टियां होती हैं, जिससे मरीज शरीर का सारा पानी बाहर आ जाता है।इसका सीधा असर ब्लड प्रेशर पर पड़ता है।ब्लड प्रेशर लो हो जाता है।समय पर इलाज न हो जान भी जा सकती है।और फिर साफ पानी न मिलने पर मरीज की मौत कुछ घंटों के अंदर हो सकती हैअब भी दुनिया में हर साल हैजा की चपेट 30 से 50 लाख लोग आते हैं और इनमें से करीब एक से सवा लाख लोगों की मौत हो जाती है।
1940 के आसपास दुनिया भर में राजनीतिक अस्थिरता थी।और फिर भारत भी ब्रिटिश राज काज से लड़ रहा था। और फिर 1941 के आस पास यह बीमारी भारत के गांवों में फैल गई।ऐसे फैली कि गांव के गांव साफ हो जाते।1940 के दौर में भारत में हैजे के कारण होने वाली मौतों की संख्या काफी ज्यादा थी।शुरू में लोग समझ नहीं सके लेकिन फिर दुनियाभर में इस बीमारी ने तबाही मचा दी।बताया जाता है कि 1975  के दशक में बंगाल की खाड़ी के इलाके में यह फिर से फैला था

क्या है इलाज
1990 के दशक में टीके की खोज के बाद इस पर काबू पाया गया हालांकि अब भी यह खत्म नहीं माना जा सकता है। छोटे और विकासशील देशों को कॉलरा ने पिछले चार दशकों में खासा प्रभावित किया है।यह बीमारी रह-रह कर गांवों में अब भी फैल जाती है। हाल ही में सामने आई राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल 2019 के अनुसार, हर साल भारत में हैजे के 100 से ज्यादा मामले सामने आते हैं. इसका इलाज सिर्फ टीका ही है।

चेचक
यह बीमारी ग्रामीण इलाकों में गहरी पैठी अंधविश्वासों में लिप्त लोगों में जागरुकता की कमी और हाईजीन की समस्या ने इसे तेज़ी से फैलने दिया। चेहरे और शरीर पर लाल धब्बों और दागों के साथ होने वाला यह संक्रमण भारत में साठ के दशक में काफी फैला। चेचक से 18वीं सदी के प्रारंभ में यूरोप में हर साल चार लाख लोगों की जान जाती थी। 20वीं सदी में चेचक की वजह दुनियाभर में लगभग 30 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। चेचक दो तरह के होते हैं-

स्मालपॉक्स (बड़ी माता)

यह बीमारी ग्रामीण इलाकों में गहरे पैठी।अंधविश्वासों में लिप्त 15वीं शताब्दी में इसे ‘व्हाइट पॉक्स’ कहा गया।इस बीमारी में शरीर पर छोटे दाने हो जाते हैं।शुरू में इसकी मृत्यु दर 35 प्रतिशत थी। भारत में इसका प्रभाव 19वीं सदी की शुरुआत में देखा गया।

चिकनपॉक्स (छोटी माता)
चिकन पॉक्स के संक्रमण से पूरे शरीर में फुंसियों जैसी चकत्तियां हो जाती हैं।


फैलने की वजह
बड़ी माता दो वायरसों व्हेरोला प्रमुख और व्हेरोला के कारण होती है।वहीं छोटी माता वेरीसेल्ला जोस्टर नाम के वायरस से फैलती है। सामान्यत: चेचक, बीमार के संपर्क में आने से फैलता है। चेचक के वायरस पीड़ित के शरीर में पांच से सात दिनों तक प्रभावी रहता है।
क्या है इलाज
चेचक का कोई इलाज नहीं है।यह संक्रमण की बीमारी है जो पांच से सात दिनों तक रहती है।इसे रोकने के लिए टीका लगाया जाता है।भारत में 1960 के दशक के आसपास इसका प्रभाव बढ़ा।1970 में इसे रोकने का अभियान शुरू किया गया।इस अभियान में पूरी जनसंख्या को टीका लगाना था।जो कि काफी मुश्किल टास्क था।1977 से इसके उन्मूल का दावा होता है। इसके बाद भी भारत में हर साल लगभग 27 लाख बच्चों को चेचक होता है।डॉक्टर्स की सलाह रहती है कि 12 से 15 साल तक के बच्चों को टीका लगवा देना चाहिए.

फिलहाल, भारत में कोरोना वायरस के अब तक 81 मामले सामने आ चुके हैं।आशंका जताई जा रही है कि केसेस और बढ़ सकते हैं, ऐसे में भारत सरकार ने हेल्थ और ट्रैवल एडवाइजरी जारी कर दी है।15 अप्रैल तक के लिए सभी वीज़ा रद्द कर दिये हैं।

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