वंदे मातरम् पर शर्मिला टैगोर की टिप्पणी पर कंगना रनौत की प्रतिक्रीया, ‘अपने आप को धार्मिक नजरिए तक सीमित न करें’

Kangana Ranaut’s reaction to Sharmila Tagore’s comment on Vande Mataram: ‘Do not limit yourself to a religious perspective.’चिरौरी न्यूज

मुंबई: राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर जारी राजनीतिक बहस अब बॉलीवुड तक पहुंच गई है। दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर की हालिया टिप्पणी पर अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कंगना ने शर्मिला टैगोर की बात रखने के अधिकार का सम्मान करते हुए कहा कि एक कलाकार के तौर पर कविता और कला को केवल धार्मिक नजरिए से देखना सीमित सोच है।

शर्मिला टैगोर ने हाल ही में एक एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो अंतरे सभी धर्मों के लोगों के लिए अधिक सहज हो सकते हैं। उनके मुताबिक, बाद के अंतरों में काली और दुर्गा जैसी देवी-देवताओं के संदर्भ हैं, जिन्हें एकेश्वरवाद में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए स्वीकार करना कठिन हो सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि देश के सभी धार्मिक समुदायों को साथ लेकर चलना है, तो राष्ट्रगीत के पहले दो अंतरे अधिक व्यापक रूप से स्वीकार किए जा सकते हैं।

कंगना ने कहा- कविता में रूपकों को समझना जरूरी

शर्मिला टैगोर की टिप्पणी का वीडियो अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर शेयर करते हुए कंगना रनौत ने लिखा कि वह उनकी आपत्ति व्यक्त करने की बात की सराहना करती हैं, लेकिन एक कलाकार के तौर पर कविता की उनकी व्याख्या से हैरान हैं।

कंगना ने तर्क दिया कि कविता और गीतों में शब्दों का इस्तेमाल अक्सर रूपकों के तौर पर किया जाता है। उनके अनुसार, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखना उसके ऐतिहासिक और कलात्मक महत्व को सीमित करना होगा।

कंगना ने ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता संग्राम की भावना से जोड़ते हुए कहा कि इसमें ‘शक्ति’ का आह्वान राष्ट्र को जागृत करने के प्रतीक के तौर पर समझा जा सकता है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के ‘लोहे जैसी मांसपेशियों और फौलाद जैसी नसों’ वाले विचार का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां भी ‘शक्ति’ का इस्तेमाल सामर्थ्य और ऊर्जा के प्रतीक के रूप में किया गया था।

कंगना ने अंत में शर्मिला टैगोर से अपील करते हुए कहा कि इस मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम नजरिए से आगे बढ़कर कला और उसके रूपकों के संदर्भ में समझना चाहिए। उन्होंने शर्मिला के प्रति सम्मान जताते हुए अपनी बात समाप्त की।

क्यों उठा ‘वंदे मातरम्’ पर विवाद?

‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी और बाद में इसे उनके उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। गीत के पहले दो अंतरों में मुख्य रूप से मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति सम्मान का वर्णन है। बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं और धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ मिलते हैं। इसी वजह से समय-समय पर इसके पूर्ण संस्करण को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस होती रही है।

हालिया विवाद के बीच कांग्रेस कार्यसमिति ने भी पार्टी के 1937 के रुख को दोहराते हुए कहा है कि कांग्रेस कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो अंतरे गाए जाने चाहिए।

मुकेश खन्ना ने भी रखी अलग राय

इस बहस के बीच अभिनेता मुकेश खन्ना भी ‘वंदे मातरम्’ को लेकर अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने पहले कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ को देश का राष्ट्रगान बनाया जाना चाहिए और ‘जन गण मन’ की जगह इसे राष्ट्रगान का दर्जा मिलना चाहिए।

हालांकि, भारत में वर्तमान में ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त है। दोनों ही रचनाएं देश के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय पहचान से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि ‘वंदे मातरम्’ को धार्मिक संदर्भों, साहित्यिक रूपकों और स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत—इनमें से किस व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

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