करतार सा ना कोय: चैम्पियन पहलवान, कामयाब प्रशासक!

राजेंद्र सजवान

इसमें दो राय नहीं कि उपलब्धियों को देखते हुए सुशील कुमार भारत के श्रेष्ठ पहलवान हैं। उन्होने बीजिंग और लंदन में क्रमशः कांस्य और रजत पदक जीत कर ओलंपिक पदकों के लिए तरसते देश को राहत दी थी। जहाँ तक भारी वजन के पहलवानों की बात है तो सबसे बड़ी  कामयाबी का रिकार्ड पंजाब के करतार सिंह के नाम दर्ज़ है जिसने 1978 में बैंकाक और 1986 में स्योल एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीत कर ऐसा रिकार्ड कायम किया है जिसे तोड़ने में कोई भी भारतीय पहलवान अब तक सफलता हासिल नहीं कर पाया है। विदेशी भूमि पर दोहरा स्वर्ण जीतने वाले इस जाँबाज़ पहलवान के नाम एक रिकार्ड यह भी है कि उसने पहला स्वर्ण 90 किलो में और दूसरा 100 किलो में जीता। 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों  में उसके नाम रजत पदक भी है। इतना ही नहीं, कामनवेल्थ चैंपियनशिप, अनेक अंतरराष्ट्रीय और ख़ासकर वेटरन मुकाबलों में करतार ने ढेरों  पदक जीते हैं और सबसे बड़ी उम्र तक अखाड़े में डटे रहने वाले योद्धा के रूप में जाने जाते रहे हैं।

सालों बाद करतार का उल्लेख इसलिए किया जा रहा है क्योंकि आज दो जून को उनकी शादी की वर्षगाँठ है और एक महान पहलवान और नेक इंसान की खुशी में शामिल होना तो बनता है। इस अवसर पर उन्होने सबसे पहली प्रतिक्रिया के रूप में सुशील और योगेश्वर को बधाई दी और कहा कि इन दोनों पहलवानों ने भारतीय कुश्ती की शान को बढ़ाया है और वह सब कर दिखाया जिसकी भारतीय कुश्ती को वर्षों से तलाश थी। 1980, 84 और 88 के ओलंपिक में भाग लेने के बावजूद कोई पद्क नहीं जीत पाने का उन्हें मलाल है लेकिन इस नाकामी के पीछे एक बड़ा कारण यह था कि उस दौर में सुविधाओं का अकाल था। भले ही गुरु हनुमान और राज सिंह जैसे गुरुओं से सीखने का लाभ मिला पर तब तक बाकी देश तकनीक के मामले में बहुत आगे निकल चुके थे।

 

बहुत कम लोग जानते हैं कि करतार के असली गुरु सिने स्टार और भारत में फ्री स्टाइल कुश्ती के जनक दारा सिंह थे। दारा सिंह के प्रयास से करतार को गुरु हनुमान के अखाड़े में प्रवेश मिला और इसके साथ ही उनकी सफलताओं ने नयी उड़ान भरी। करतार ना सिर्फ़ एक बेमिसाल पहलवान रहे अपितु उनकी गिनती पंजाब के सबसे कामयाब प्रशासक और पुलिस अधिकारी के रूप में भी की जाती है। पाँच साल तक पंजाब सरकार के खेल निदेशक पद पर रहते उन्होने खिलाड़ियों को रोज़गार का अभियान चलाया और तमाम खेलों से जुड़े खिलाड़ी विभिन्न विभागों में भर्ती किए गए। आईजी पुलिस के रूप में उनके कार्यकाल को खूब सराहा गया लेकिन खेल और ख़ासकर कुश्ती हमेशा उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहे।

2013 में सेवानिवृत हुए करतार सिंह आज भी पूरी तरह फिट हैं और देश के पहलवानों और खिलाड़ियों के लिए हमेशा उदाहरण माने जाते हैं। खेल से जुड़े रहने की आदत ने उन्हें एक अलग तरह की लोकप्रियता दी है। बड़े बड़े राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय दंगलों के आयोजन में उन्हें महारत हासिल है। अपने एनआरआई दोस्तों की मदद से वह पंजाब में कुश्ती, मैराथन और अन्य खेलों के मेले सजाते रहे हैं और कहते हैं कि जब तक जीवन है, खेलता और खिलाता रहूँगा।

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