कोहबर: मिथिला की दीवारों से विलुप्त होते संस्कारों तक
कृष्णमोहन झा
भारत की सांस्कृतिक परंपरा को समझना हो तो केवल उसके ग्रंथों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है। भारत की संस्कृति उसके गांवों में, लोकगीतों में, विवाह संस्कारों में, लोकचित्रों में और उन प्रतीकों में भी सुरक्षित है जिन्हें पीढ़ियां बिना किसी लिखित दस्तावेज के एक-दूसरे तक पहुंचाती रही हैं। मिथिला की ‘कोहबर’ परंपरा ऐसी ही सांस्कृतिक विरासत है।
डॉ. अनिल कुमार झा की पुस्तक ‘कोहबर’ इसी लोकपरंपरा को केंद्र में रखकर भारतीय समाज की उस सांस्कृतिक स्मृति को समझने का प्रयास है, जो आज तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में कहीं पीछे छूटती जा रही है। 316 पृष्ठों की यह कृति कोहबर को केवल विवाह के बाद नवदंपती से जुड़े कक्ष के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसके भीतर छिपे प्रेम, दाम्पत्य, परिवार, प्रकृति, लोककला और सांस्कृतिक प्रतीकों के व्यापक संसार की पड़ताल करती है। पुस्तक के आवरण से ही मिथिला की चित्रपरंपरा और उसके प्रतीक संसार की झलक मिल जाती है।
मिथिला का लोकजीवन अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक चेतना के लिए जाना जाता है। यहां विवाह केवल सामाजिक अनुबंध नहीं रहा, बल्कि संस्कारों और लोकविश्वासों की एक विस्तृत श्रृंखला रहा है। इसी परंपरा में कोहबर का अपना विशेष स्थान है।
कोहबर की दीवारों पर बने चित्रों को यदि केवल सजावट समझ लिया जाए तो इस परंपरा के वास्तविक अर्थ को समझना संभव नहीं होगा। सूर्य, चंद्रमा, कमल, मछली, पक्षी, सर्प, हाथी, कछुआ और अन्य प्रतीकों के माध्यम से नवदंपती के सुखी जीवन, समृद्धि, सृजन, दीर्घायु और मंगल की कामना व्यक्त की जाती रही है। डॉ. झा ने पुस्तक में इन प्रतीकों की अलग-अलग सांस्कृतिक व्याख्या की है। सूर्य को जीवन और ऊर्जा, पक्षियों को प्रेम और विश्वास तथा कछुए को दीर्घायु और दायित्व से जोड़कर देखा गया है।
मछली, कमल, हाथी और सर्प जैसे प्रतीकों की व्याख्या भी इसी सांस्कृतिक संदर्भ में की गई है।
अर्थात कोहबर की दीवार पर बना चित्र वास्तव में एक लोकभाषा है—ऐसी भाषा जिसे गांव का वह व्यक्ति भी समझता था जो शायद लिखना-पढ़ना नहीं जानता था। ‘कोहबर’ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि लेखक ने लोकपरंपरा को भारतीय प्रेम-साहित्य और पौराणिक आख्यानों से जोड़ने का प्रयास किया है।
राम-सीता, शिव-पार्वती, नल-दमयंती, अज-इंदुमती और शकुंतला-दुष्यंत जैसे प्रसंगों के माध्यम से भारतीय परंपरा में प्रेम के विभिन्न रूपों को सामने रखा गया है। सीता की विदाई जैसे प्रसंग को चित्र और साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् के प्रसंगों को चित्रकला के संदर्भ में रखने का प्रयास भी पुस्तक में दिखाई देता है।
यहां पुस्तक का केंद्रीय प्रश्न केवल प्रेम नहीं है। प्रश्न यह है कि भारतीय समाज ने प्रेम को परिवार, परिवार को संस्कार और संस्कार को सामाजिक निरंतरता से कैसे जोड़ा। यही वह बिंदु है जहां ‘कोहबर’ आज के समय से संवाद करने लगती है।
आज भारतीय समाज अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। परिवार की संरचना बदल रही है, संयुक्त परिवारों का स्थान छोटे परिवार ले रहे हैं, विवाह संस्कारों का स्वरूप बदल रहा है और लोकपरंपराएं धीरे-धीरे बाजार तथा आधुनिक जीवनशैली के दबाव में अपनी पुरानी भूमिका खो रही हैं।
यह परिवर्तन अपने आप में गलत नहीं है। समाज परिवर्तनशील है और होना भी चाहिए। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब परिवर्तन के साथ स्मृति भी समाप्त होने लगे। हम आधुनिक बनें, लेकिन अपनी सांस्कृतिक स्मृति खोकर नहीं।
आज की पीढ़ी को कोहबर के बारे में शायद यह मालूम हो कि यह मिथिला की कोई पारंपरिक चित्रकला है। लेकिन उसके पीछे नवदंपती के लिए की जाने वाली मंगलकामना, प्रकृति के प्रति आस्था, परिवार की निरंतरता और सामाजिक उत्तरदायित्व की जो भावना थी, वह धीरे-धीरे हमारी सामूहिक चेतना से दूर हो रही है।
यही कारण है कि ‘कोहबर’ जैसी कृति का महत्व केवल अतीत को दर्ज करने तक सीमित नहीं रह जाता।यहां पुस्तक एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने छोड़ती है क्या केवल परंपरा को बचा लेना पर्याप्त है? शायद नहीं।
यदि कोहबर की दीवार बची रहे लेकिन उसके प्रतीकों का अर्थ समाप्त हो जाए तो परंपरा का केवल बाहरी आवरण बचता है। किसी संस्कृति को जीवित रखने के लिए उसके अर्थ, संवेदना और जीवन-मूल्यों को भी जीवित रखना आवश्यक है।
इस दृष्टि से ‘कोहबर’ का प्रयास उल्लेखनीय है। लेखक ने सूर्य, पक्षी, मोर, हंस, कछुआ, कमल, हाथी, सर्प और मछली जैसे प्रतीकों की व्याख्या करके यह बताने की कोशिश की है कि लोकचित्रों में दिखाई देने वाली प्रत्येक आकृति के पीछे कोई न कोई सांस्कृतिक अर्थ मौजूद है।
आज की पीढ़ी के लिए क्यों जरूरी है ‘कोहबर’?
हमारी सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं कि युवा पीढ़ी आधुनिक हो रही है। चुनौती यह है कि क्या आधुनिकता और सांस्कृतिक चेतना साथ-साथ चल सकती हैं। नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अर्थ यह नहीं कि उसे अतीत में वापस ले जाया जाए। इसका अर्थ है कि उसे बताया जाए कि **हमारे पूर्वज किन अनुभवों और मूल्यों के आधार पर समाज का निर्माण करते आए थे।
परंपरा का अर्थ जड़ता नहीं
परंपरा वह स्मृति है जो समाज को यह बताती है कि वह कहां से आया है। इसीलिए विवाह संस्कारों, लोकगीतों, लोकचित्रों और पारिवारिक परंपराओं का संरक्षण केवल संस्कृति विभागों या संग्रहालयों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। यह परिवार, समाज, साहित्यकारों और नई पीढ़ी की साझा जिम्मेदारी है।
डॉ. अनिल कुमार झा की शैक्षणिक पृष्ठभूमि में एम.ए., पीएच.डी. और एल.एल.बी. का उल्लेख है तथा उनकी पूर्व कृति शतपथ ब्राह्मण कालीन समाज भी प्रकाशित हो चुकी है।
‘कोहबर’ में भी उनके अध्ययन की प्रवृत्ति दिखाई देती है। हालांकि पुस्तक के कुछ हिस्सों में विषय-विस्तार इतना अधिक हो जाता है कि सामान्य पाठक के लिए उसकी गति कुछ धीमी पड़ती है और कुछ सांस्कृतिक मान्यताओं के साथ तुलनात्मक अकादमिक विवेचन की गुंजाइश भी महसूस होती है। लेकिन यही विस्तार पुस्तक को केवल लोककला की परिचयात्मक पुस्तक बनने से रोकता है।
‘कोहबर’ का महत्व इसलिए भी है कि यह मिथिला की एक परंपरा से शुरू होकर पूरे भारतीय समाज के सामने एक बड़ा प्रश्न रखती है— क्या विकास की यात्रा में हम अपनी सांस्कृतिक स्मृति को पीछे छोड़ते जा रहे हैं? मिथिला की एक विवाह परंपरा में सुरक्षित प्रतीकों की पड़ताल करते-करते पुस्तक हमें भारतीय परिवार, प्रेम, प्रकृति और सामाजिक संस्कारों के उन मूल्यों तक ले जाती है, जो किसी एक क्षेत्र की संपत्ति नहीं हैं।
इस अर्थ में ‘कोहबर’ केवल मिथिला की पुस्तक नहीं है। यह उस भारत की पुस्तक है जिसकी संस्कृति मंदिरों और ग्रंथों में जितनी सुरक्षित रही है, उतनी ही घर की दीवारों, लोकगीतों और पारिवारिक संस्कारों में भी। आज जब अनेक पारंपरिक संस्कार धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर हैं, तब इस विरासत को केवल भावुक होकर याद करने की नहीं, बल्कि उसके अर्थ को समझने की आवश्यकता है।
डॉ. अनिल कुमार झा की ‘कोहबर’ इसी समझ की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। किसी लोकपरंपरा को जीवित रखने का सबसे अच्छा तरीका शायद यही है कि हम उसके चित्रों को केवल देखें नहीं, उन्हें पढ़ना सीखें। और ‘कोहबर’ हमें यही पढ़ना सिखाती है।
