नजीर पेश किया है न्यूजीलैंड ने, हम कब सुधरेंगे ?

निशिकांत ठाकुर

आज की तारीख में विश्व के तीन देश ऐसे हैं, जिन्होंने कोरोना रूपी महामारी को अपने देश से बाहर खदेड़ दिया है। ये तीन देश हैं – वियतनाम, आइसलैंड और न्यूजीलैंड। इन देशों में वियतनाम ऐसा देश है, जिसकी आबादी लगभग दस करोड़ है। यह आइसलैंड और न्यूजीलैंड से भी छोटा देश है। इन दोनों देशों की आबादी भी कम है। अभी दो दिन पहले न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री जोसिंडा अर्डन ने विश्व में अपने नाम का डंका पिटवाकर यह दिखा दिया है कि यदि आत्मबल हो, जनता तथा समाज का समर्थन मिला हुआ हो, तो कुछ भी असंभव नहीं है। कोरोना में सरकारी व्यवस्था और जन समर्थन के बूते ही सफलता हासिल की जा सकती है। जोसिंडा न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री है और विश्व की ऐसी पहली महिला प्रधानमंत्री है, जिन्होंने अपने देश से करोना महामारी को खदेड़कर अपने नागरिकों को रोग मुक्त करा दिया है।

यह ठीक है कि न्यूजीलैंड एक छोटा देश है , लेकिन करोना रूपी महामारी को अपने देश से भागने में जो अद्भुत आत्मबल का परिचय दिया, उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है । खबरों के अनुसार करोना से पीड़ित आखिरी मरीज को इसी सप्ताह अस्पताल से छुट्टी दे दी गई । अपने देश की इस उपलब्धि की घोषणा करते हुए न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री झूम उठी। प्रधानमंत्री जोसिंडा अर्नेड ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा करते हुए कहा कि कैबिनेट के फैसले के अनुसार, सोमवार यानी 8 जून, 2020 की आधी रात से सारी पाबंदियों पर से रोक हटा लेने का निर्णय लिया गया है। आंकडों की बात करें, तो पचास लाख की आबादी वाले इस देश में 22 लोगों की मौत हुई। 26 फरवरी को जब पहला कोविड 19 का मरीज आया था, तभी से लोगों को क्वारेंटिन करना शुरू कर दिया था। बाहरी देशों से आने वाले लोगों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई थी। कोरोना वायरस को खत्म करने के लिए एक एप लॉन्च किया गया, जिसके द्वारा मामला सामने आने पर सक्रियता दिखाई गई और आखिरकार सक्रियता के आधार पर लोकल ट्रांसमिशन को रोक दिया गया। यूरोपीय देशों में इस संक्रामक महामारी के कारण भारी नुकसान हुआ है । एक रिसर्च के अनुसार, 58 लाख से अधिक लोग इससे संक्रमित है और यह लेख लिखे जाने तक 3,60,00 लोगों की मौत पूरे विश्व में हो चुकी है ।

अब आइए अपने भारत की बात करते हैं। अपने देश के हालात पर भी चर्चा करते हैं। लगभग तीन महीने के लॉकडाउन के बाद भी हम अपने हालात को नहीं सुधार पाए हैं। अब तो पूरे विश्व में सबसे प्रभावित देशों की सूची में हम तीसरे पायदान पर आ चुके हैं। मुंबई और दिल्ली की हालत बद से बदतर होती जा रही है। यहां के लोग किसी बडी अनहोनी की आशंका में जी रहे हैं। मुंबई- दिल्ली सहित देश के कई दूसरे हिस्सों में भी संक्रमण का बढ़ना बदस्तूर जारी है। सरकार की ओर से अनलाॅक की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अब सब कुछ खुल जाने के बाद यह कहा जा रहा है कि अगले महीने तक देश की बुरी स्थिति हो जाएगी।

केवल दिल्ली कि ही बात करें, तो यहां के लिए यह कहा जा रहा है कि जुलाई में संक्रमित मरीजों की संख्या पांच लाख पार कर जाएगी। यह बात आम आदमी नहीं, राज्य के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने खुद कही है। इसके लिए दिल्ली को कम से कम 80 हजार बेड की जरूरत होगी। इसी मात्रा में अस्पतालों और डॉक्टरों की आवश्यकता होगी। दिल्ली में कोरोना को लेकर किस प्रकार की राजनीति हुई और सरकारी निकायों के बीच आंकडों की राजनीति हो रही है, यह पूरा देश देख और सुन रहा है। दिल्ली से इतर भी बात करें, तो देश में अभी लगभग 9 हजार कोरोना के गंभीर मरीज हैं। इस रोग से लड़ा कैसे जाएगा और इसे अपने देश से भागा कर देश को करोना मुक्त कैसे करेंगे ? इस पर अभी कोई ठोस रणनीति या कार्यनीति नजर नहीं आ रही है।

जब पहला लॉक डाउन हुआ था तो प्रधानमंत्री ने कहा था कि महाभारत की लड़ाई 18 दिन में जीती गई थी। हम कोरोना पर 21 दिन में विजय प्राप्त कर लेंगे । जेहन में अब सवाल उठता है कि क्या बिना सोचे समझे यह लॉक डाउन भूल बस किया गया था और घोषणाएं जनता को मूर्ख बनाने के लिए बिना सोचे विचारे कर दी गई ? आखिर देश की जनता के साथ इतना बड़ा मजाक क्यों किया जा रहा है ? अब वही भोली भाली जनता उग्र होती जा रही और पता नहीं उसका रुख कब क्या हो जाए ?

अब तक तो हम अपने देश के विभिन्न प्रांतों के निवासियों के लिए अपने अखबार या टेलीविजन पर बात करके और लिखकर अपने ही देश में रहकर उसे बांटते थे और उस प्रवासी कहते थे , अब तो हमारे प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय को भी इस बात के लिए सहमत कर लिया कि इस लॉक डाउन में प्रवासी पर जो मुकदमे दायर किए गए हैं उन मुकदमों को वापस लिया जाए और उन प्रवासियों को पंद्रह दिनों में घर भेजा जाय । इतनी समस्याओं से जूझने के बाद भी हम शाब्दिक उलट पलट करके सर्वोच्च न्यायालय तक को अपने गलत शब्दों से प्रभावित कर लेते है । यह सच है कि एक गलत बात को बार बार दोहराने से झूठ भी सच हो जाता है । माननीय सर्वोच्च न्यायालय का आदेश शत प्रतिशत उपयुक्त है , लेकिन जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रवासी कहलवाया जा रहा है। वह प्रवासी (विदेशी ) नहीं अपने ही देश के स्वदेशी कामगार मजदूर है । प्रवासी शब्द की यह भूल कहां और किस उद्देश्य से शुरू हुई, इसकी निश्चित रूप से जांच की जानी चाहिए।

अब यदि हम पूरे विश्व पर नजर दौड़ाएं तो कई और देश है जिन्होंने अपने यहां से कोरोना रूपी महामारी से अपने को मुक्त कर लिया है। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री तो एक साक्षात उदाहरण हैं, जिसे रखकर यह बताने का प्रयास किया जा सकता है कि हमसे भूल कहां हुई ? और जब तक हम अपनी भूल को स्वीकार नहीं करेंगे इस महामारी का निदान हम कतई नहीं ढूंढ़ पाएंगे। रही बात बड़े देशों की, तो कोरोना के जन्मदाता के रूप में चीन को देखा जाता है और माना जाता है। अमेरिका तो खुलेआम चीन को ही जिम्मेदार ठहरा चुका है। हालांकि, अब धीरे धीरे चीन में सब कुछ सामान्य होता जा रहा है ।

भारत में जहां मरीजों की संख्या दिन प्रतिं बढ़ती ही जा रही है। हमारी सरकार ने खुलेआम सार्वजनिक जगहों को खोलने , आने जाने , खाने पीने के रेस्टोरेंट को खोलने का निर्णय लिया है । क्या इससे महामारी का प्रकोप रुक जाएगा ? क्या हम फिर उसी आजाद दुनियां में लौट आएंगे अथवा हमें अब कोरोना रूपी भयंकर महामारी के साथ जीने के लिए मजबूत होना पड़ेगा ? यदि ऐसा है और हमारी सरकार हमारी सुरक्षा करने में सफल नहीं हो पा रही है, तो फिर धिक्कार है ऐसी सरकार को और उनके कर्ता धर्ता को जो खुद को जनसेवक और प्रधानसेवक कहते हैं। क्योंकि यदि यह इतने अक्षम हैं, तो फिर इन्हे सत्ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए मेरी मान्यता है कि सरकार में बैठे सभी नेताओ को त्यागपत्र देकर दूसरे योग्य व्यक्तियों को सरकार चलाने का अवसर देना चाहिए। नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि जिस दिन जनता के गले तक पानी आ जाएगा, उस दिन ऐसे लोगों को सत्ता से बाहर करने मै उन्हें समय नहीं लगेगा । इसलिए सरकार अर्थात सत्तरूढ दल अब संभाल जाएं, क्योंकि जनता के सब्र का बांध अब टूटने वाला है । जोसिंडा अर्डेन्न भले ही बहुत ही छोटे देशकी प्रधान मंत्री होने के कारण न्यूजीलैंड को महामारी से सुरक्षित कर लिया हो, लेकिन भारत की आबादी तो करोड़ों में है, वहां कैसे नियंत्रित किया जा सकता है तो प्रयोग तो छोटे से ही किया जाता है ।

(लेखक वरिष्ठ राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक हैं। चिरौरी न्यूज का इनके विचार से पूर्णतः सहमत होना जरूरी नहीं)

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