वंदे मातरम् नहीं गाने पर सजा नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘अंतरात्मा की आपत्ति’ के अधिकार का रखा जाए ध्यान
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: वंदे मातरम् को लेकर चल रही कानूनी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से कहा कि किसी व्यक्ति की ‘अंतरात्मा की आपत्ति’ (Conscientious Objection) को केवल राष्ट्रगीत गाने से इनकार करने के आधार पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने 1986 के अपने उस ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें धार्मिक आधार पर राष्ट्रगान गाने से इनकार करने वाले स्कूली बच्चों के अधिकारों की रक्षा की गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ मंगलवार को कर्नाटक संगीत के गायक टी. एम. कृष्णा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
कृष्णा ने 2026 में संशोधित Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 की धारा 3 और गृह मंत्रालय की ओर से जारी 28 जनवरी तथा 9 जुलाई 2026 के निर्देशों को चुनौती दी है। याचिका में खास तौर पर वंदे मातरम् के सभी छह अंतरों को गाने की अनिवार्यता पर सवाल उठाया गया है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अदालत इस बात की जांच करेगी कि किसी ‘conscientious objector’ को वंदे मातरम् नहीं गाने पर आपराधिक दंड का सामना करना पड़ सकता है या नहीं। उन्होंने केंद्र के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि 1986 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा Bijoe Emmanuel बनाम State of Kerala मामले में स्थापित कानून को संशोधित कानून पर भी लागू माना जाना चाहिए।
1986 के उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन तीन स्कूली बच्चों के पक्ष में फैसला दिया था, जो अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाते थे, लेकिन राष्ट्रगान के दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे। अदालत ने कहा था कि केवल राष्ट्रगान नहीं गाने के कारण उन्हें स्कूल से निकालना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
न्यायमूर्ति बागची ने मंगलवार को यह भी स्पष्ट किया कि अदालत इस समय यह तय नहीं कर रही है कि राष्ट्रगीत क्या होना चाहिए या उसमें कितने अंतरे होने चाहिए। यह निर्णय लोकतांत्रिक सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत का सवाल यह है कि अगर किसी व्यक्ति को धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर इसे गाने में आपत्ति है, तो क्या उसे आपराधिक सजा दी जा सकती है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि वंदे मातरम् से जुड़े राष्ट्रीय भावनाओं या आकांक्षाओं पर अदालत को दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है। यह तय करना राज्य का विषय है। उन्होंने कहा कि अदालत का ध्यान इस बात पर रहेगा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता तथा अंतरात्मा की स्वतंत्रता का दावा करने वाले व्यक्ति को दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा मिलती है या नहीं।
याचिकाकर्ता ने छह अंतरों को लेकर उठाए सवाल
टी. एम. कृष्णा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर ने दलील दी कि संशोधित कानून में ‘राष्ट्रीय गीत’ (National Song) शब्द का स्पष्ट अर्थ या परिभाषा नहीं दी गई है। उनके मुताबिक, इससे कानून के गलत इस्तेमाल की गुंजाइश पैदा हो सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि गृह मंत्रालय के निर्देश एक ऑफिस मेमोरेंडम के जरिए जारी किए गए हैं,जिन्हें राजपत्र में अधिसूचित नहीं किया गया। मुरलीधर ने दलील दी कि लंबे समय से वंदे मातरम् के संदर्भ में मुख्य रूप से पहले दो अंतरों की परंपरा रही है, जबकि अब सभी छह अंतरों को अनिवार्य किए जाने का सवाल उठाया जा रहा है।
याचिका में यह भी चुनौती दी गई है कि जब वंदे मातरम् और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाएं, तो वंदे मातरम् को पहले रखा जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन प्रावधानों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता, समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता से जुड़े संवैधानिक सवाल पैदा होते हैं।
कानून में तीन साल तक की सजा का प्रावधान
2026 में संशोधित धारा 3 के तहत राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने या ऐसा व्यवधान पैदा करने पर तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इसी दंडात्मक प्रावधान को लेकर याचिका में संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र को औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया। अदालत ने कहा कि वह इस स्तर पर नोटिस जारी करने के बजाय यह अपेक्षा करती है कि Bijoe Emmanuel में घोषित कानून संशोधित अधिनियम पर लागू होगा।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर के बीच तीखी बहस भी हुई। मेहता ने याचिका पर दलील देते हुए कहा कि “धर्मनिरपेक्षता इतनी संकीर्ण नहीं हो सकती।” बाद में कानून बनाने की प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि कानून निर्माण “नक्सलियों के विचार के अनुसार” नहीं हो सकता। इस टिप्पणी पर मुरलीधर ने कड़ी आपत्ति जताई और सॉलिसिटर जनरल से अपने शब्द वापस लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि ऐसी भाषा एक कानून अधिकारी के पद के अनुरूप नहीं है।
मेहता ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार किया और कहा कि उनका संदर्भ उन लोगों से था जो उनके अनुसार कानून बनाने की संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान नहीं करते। अदालत ने इस मौखिक बहस में हस्तक्षेप नहीं किया और कहा कि वह इन टिप्पणियों को रिकॉर्ड में नहीं ले रही है।
सुप्रीम कोर्ट की मंगलवार की सुनवाई के बाद विवाद का केंद्र यह नहीं है कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत है या नहीं, बल्कि यह है कि किसी व्यक्ति को धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण इसे गाने से इनकार करने पर दंडित किया जा सकता है या नहीं। अदालत ने इस सवाल पर 1986 के Bijoe Emmanuel फैसले में स्थापित संवैधानिक सिद्धांत को महत्वपूर्ण माना है। मामले की आगे की सुनवाई में संशोधित कानून और गृह मंत्रालय के निर्देशों की संवैधानिक वैधता पर और स्पष्टता आ सकती है।
