‘टांग खिंचाई’ हो राष्ट्रीय खेल
राजेन्द्र सजवान
सालों पहले खेल मंत्रालय बता चुका है कि हॉकी भारत का राष्ट्रीय खेल नहीं है। यह भी सच है कि क्रिकेट भले ही राष्ट्रीय खेल नहीं पर सबसे ज्यादा खेला जाने वाला, पसंद किया जाने वाला और लोकप्रिय खेल है। मौके की नजाकत को देखते हुए भारतीय कुश्ती फेडरेशन के अध्यक्ष सांसद ब्रज भूषण शरण सिंह ने कुछ माह पहले मंशा ज़ाहिर करते हुए कहा था कि वह संसद में कुश्ती का दावा पेश कर सकते हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि इस बारे में पहले ही कुछ सांसदों से बात कर चुके हैं और ओलंपिक में कुश्ती के नतीजों को देखते हुए सभी कुश्ती को राष्ट्रीय खेल बनाने के विचार को समर्थन देने को तैयार हैं।
लेकिन फिलहाल इस दिशा में कोई ठोस राय बनती नज़र नहीं आती। हॉकी, क्रिकेट और कुश्ती के दावे पर एक ऐसा खेल भारी पड़ता दिखाई पड़ रहा है, जिसे अपने देश में सभी खेल, खिलाड़ी और अधिकारी वर्षों से खेलते आ रहे हैं। इस खेल का नाम है ‘टांग खिंचाई”। जी हां, खेल चाहे, हॉकी, फुटबाल, क्रिकेट, जूडो, कुश्ती, मुक्केबाजी, कुछ भी हो, हमारे खिलाड़ी और अधिकारियों को कदम कदम पर यह खेल भाता है। हाल फिलहाल इस खेल को भारतीय ओलंपिक समिति में बड़े चाव के साथ खेला जा रहा है। बड़े छोटे सभी पदाधिकारी एक दूसरे की टांग खींचने से ज़रा भी परहेज नहीं कर रहे। खेल बेहद रोमांचक मोड़ पर पहुंच गया है। एक तरफ तो कोर्ट ने 57 राष्ट्रीय खेल संघों के अस्तित्व पर सवाल खड़ा किया है तो दूसरी तरफ खेल संघों के अधिकारी भारतीय ओलंपिक संघ के मंच पर महाभारत मचाये हैं।
अफसोस है तो इस बात का कि भारतीय खेलों के जिम्मेदार लोगों को इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं कि पूरी दुनिया एक बड़ी महामारी से लड़ रही है। भारत कोरोना मामलों में रिकार्ड दर रिकार्ड तोड़ रहा है लेकिन ऐसे बुरे वक्त में भी भारतीय खेल अपनी घटिया राजनीति से बाज नहीं आ रहे। दुखद यह भी है कि जिन पर देश के खेलों का दारोमदार है, वही आपस में टकरा रहे हैं।
हालांकि भारतीय ओलंपिक समिति में यह खेल वर्षों से खेला जा रहा है लेकिन हाल फिलहाल इसकी रफ्तार तेज हो गई है। आईओए अध्यक्ष और सचिव के बीच तनातनी के चलते दो धड़े बन गए हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोपों की बौछार की जा रही है। मामला अंतरराष्ट्रीय खेल संघों तक जा पहुंचा है और घर की लड़ाई विश्व स्तर पर चर्चा का विषय बन गई है।आई ओ सी और एफआईएच डॉक्टर बत्रा के पक्ष में फैसला दे चुके हैं फिर भी विवाद गहराता जा रहा है। हर कोई हैरान परेशान है लेकिन नाक की लड़ाई है कि थमती नहीं।
देखा जाए तो यह टांग खिंचाई कोई नया खेल नहीं है। सालों से तमाम भारतीय खेल संघों के पदाधिकारी इस खेल को बड़ी कुशलता के साथ खेल रहे हैं। शायद ही कोई खेल बचा हो। बचपन में लंगड़ी टाँग का खेल तो सभी ने खेल होगा लेकिन यह खेल थोड़ा उलट है। इस खेल में दूसरे खिलाड़ी की टांग खींचनी होती है और हो सके तो उसे बुरी तरह पटका भी जाता है। जैसे कि कोर्ट ने आईओए , खेल मंत्रालय और खेल संघों को बुरी तरह पटका है। जैसे हॉकी इंडिया के अध्यक्ष महोदय की टांग खींची गई है और जैसे कुछ और खेल संघों को बुरी पटखनी पड़ने वाली है। तो फिर टांग खिंचाई ही हुआ राष्ट्रीय खेल!
यह न भूलें कि टोक्यो ओलंपिक के लिए सालभर का समय बचा है और हमारे खेल आका कुछ और खेल रहे हैं।
(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार और विश्लेषक हैं। ये उनका निजी विचार है, चिरौरी न्यूज का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।आप राजेंद्र सजवान जी के लेखों को www.sajwansports.com पर पढ़ सकते हैं।)