BRICS Summit की सफलता से BJP को मिला नया राजनीतिक आत्मविश्वास, अब घरेलू मोर्चे पर बड़े फैसलों की तैयारी

Success of BRICS Summit gives BJP new political confidence; preparations now underway for major decisions on the domestic front.चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: सफलतापूर्वक BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बड़ी उपलब्धि तो दी ही है, साथ ही घरेलू राजनीति में भी नई ऊर्जा पैदा की है। G20 के बाद महज तीन वर्षों के भीतर एक और बड़े वैश्विक सम्मेलन का सफल आयोजन इस बात का संकेत माना जा रहा है कि सरकार अपनी विदेश नीति की उपलब्धियों को अब घरेलू राजनीतिक नैरेटिव में बदलने की तैयारी में है।

पिछले कुछ महीने सरकार और भाजपा के लिए अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक जीत और असम में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने से बना राजनीतिक माहौल NEET पेपर लीक विवाद और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों से कमजोर पड़ा। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना गया।

इसके बाद प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर कांग्रेस के आक्रामक हमलों ने संसद के मानसून सत्र को भी प्रभावित किया। सरकार इस दौरान कई महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयक आगे नहीं बढ़ा सकी और तीन विधेयकों से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्ट पेश करने का कार्यक्रम भी टालना पड़ा।

BRICS ने बदला राजनीतिक माहौल

ऐसे समय में BRICS Summit की सफलता सरकार के लिए सिर्फ विदेश नीति की उपलब्धि नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आई है। BRICS देशों के बीच मतभेदों के बावजूद संयुक्त घोषणा-पत्र जारी होना भारतीय कूटनीति की बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। खासतौर पर पहलगाम आतंकी हमले की स्पष्ट निंदा को भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश किया जा सकता है।

भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की दावेदारी के लिए रूस और चीन से समर्थन मिलना भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इसके अलावा शिखर सम्मेलन के दौरान ईरान और UAE के बीच बातचीत, ईरानी राष्ट्रपति का गर्मजोशी से स्वागत, रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने की दिशा में चर्चा और लगातार तीसरे वर्ष चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय बैठक ने सम्मेलन की रणनीतिक अहमियत बढ़ाई।

दिलचस्प बात यह है कि विपक्षी कांग्रेस ने भी संयुक्त घोषणा का स्वागत किया, हालांकि उसने कुछ मुद्दों पर अपनी आपत्तियां बरकरार रखीं।

मोदी की कूटनीतिक सक्रियता बनी आकर्षण का केंद्र

मेजबान देश के नेता के तौर पर प्रधानमंत्री मोदी पूरे सम्मेलन के केंद्र में रहे। तीन दिनों के दौरान उन्होंने करीब 15 राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं कीं। इसके अलावा कई अनौपचारिक बातचीत भी हुईं।

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ उनकी मुलाकातों पर विशेष नजर रही। प्रधानमंत्री की सक्रियता और विभिन्न देशों के नेताओं के साथ उनकी व्यक्तिगत केमिस्ट्री को भाजपा विदेश नीति की ताकत के तौर पर प्रस्तुत कर सकती है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजन के जरिए मोदी सरकार ने घरेलू राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की कोशिश की हो। सितंबर 2023 में भारत में आयोजित G20 Summit भी इसी रणनीति का उदाहरण माना जाता है। इससे पहले चुनावी राज्यों में विदेशी नेताओं के रोडशो और उनके दौरों को भी राजनीतिक रूप से काफी प्रचारित किया गया था।

BRICS की सफलता को देशभर में ले जाने की तैयारी

अब असली सवाल यह है कि भाजपा इस कूटनीतिक सफलता को राजनीतिक लाभ में कितनी प्रभावी तरीके से बदल पाती है। भाजपा नेताओं के मुताबिक, 17 सितंबर से शुरू होने वाले ‘सेवा संकल्प अभियान’ के दौरान BRICS Summit की सफलता को मोदी सरकार की उपलब्धियों के रूप में प्रमुखता से पेश किया जाएगा। यह अभियान प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन से शुरू होगा और 7 अक्टूबर को उनके सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर तक चलेगा।

विदेश नीति के मोर्चे पर BRICS की सफलता को प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की उपलब्धियों की सूची में प्रमुख स्थान दिया जाना तय माना जा रहा है।

कांग्रेस पर हमले के लिए BRICS बना नया मुद्दा

BRICS Summit को लेकर कांग्रेस की शुरुआती आलोचना को भी भाजपा राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश कर रही है। सम्मेलन से पहले पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम की उस टिप्पणी को भाजपा ने मुद्दा बनाया, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि भारत को ऐसे आयोजन से आखिर क्या हासिल होगा। अब भाजपा का तर्क है कि सम्मेलन के नतीजों ने इन सवालों का जवाब दे दिया है। पार्टी BRICS में भारत की कूटनीतिक उपलब्धियों और इससे मिले समर्थन को देशभर में प्रचारित करने की तैयारी में है।

वहीं, BRICS के रात्रिभोज में केवल शाकाहारी भोजन पर राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं की टिप्पणियों को लेकर भी भाजपा ने विपक्ष पर निशाना साधा है। पार्टी इसे ऐसे पेश कर रही है कि जब सम्मेलन में भारत को कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धियां मिलीं, तब विपक्ष के पास आलोचना के लिए भोजन के मेन्यू के अलावा कोई बड़ा मुद्दा नहीं था।

अब नजर परिसीमन और संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल पर

BRICS Summit के बाद राजनीतिक निगाहें अब सरकार के अगले कदम पर टिक गई हैं। खासतौर पर परिसीमन विधेयक को लेकर संभावनाएं चर्चा में हैं। संसद को अभी तक स्थगित नहीं किया गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर सरकार विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन से संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक को आगे बढ़ा सकती है।

इसके साथ ही केंद्रीय मंत्रिपरिषद में संभावित फेरबदल की चर्चा भी राजनीतिक हलकों में तेज है। भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम बनने के बाद पार्टी के संसदीय बोर्ड, केंद्रीय चुनाव समिति, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद के गठन की प्रक्रिया भी जल्द पूरी होने की संभावना जताई जा रही है।

अगले साल के विधानसभा चुनावों पर फोकस

इन तमाम घटनाक्रमों के बीच भाजपा ने अगले साल की शुरुआत में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। कुल मिलाकर, BRICS Summit ने सरकार को एक ऐसा राजनीतिक अवसर दिया है, जिसमें विदेश नीति की उपलब्धियों को आर्थिक विकास, भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व से जोड़कर पेश किया जा सकता है।

हालांकि, यह उपलब्धि घरेलू राजनीतिक चुनौतियों को अपने आप खत्म नहीं करती। NEET विवाद, बेरोजगारी, महंगाई, विपक्ष के हमले और परिसीमन जैसे मुद्दे आगे भी सरकार के सामने बने रहेंगे। ऐसे में BRICS की सफलता भाजपा के लिए एक राजनीतिक रीसेट का अवसर जरूर है, लेकिन इसे वास्तविक चुनावी लाभ में बदलना अब पार्टी की रणनीति और उसके अगले कदमों पर निर्भर करेगा। यानी BRICS के बाद सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत ने वैश्विक मंच पर क्या हासिल किया, बल्कि यह भी है कि भाजपा इस कूटनीतिक सफलता को घरेलू राजनीति में कितनी मजबूती से भुना पाती है।

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