वसुधैव कुटुम्बकम् के साथ ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ की स्थापना ही संघ का लक्ष्य

The goal of the Sangh is to establish 'Satyam Shivam Sundaram' along with Vasudhaiva Kutumbakamडॉ धनंजय गिरि

भारतीय चिंतन की मूल धारा सदैव समावेशी, सार्वभौमिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का दर्शन जहां समस्त विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की प्रेरणा देता है, वहीं “सत्यम् शिवम् सुंदरम्” जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक और सौंदर्यपूर्ण आयामों को एक साथ जोड़ता है। इन दोनों सिद्धांतों का समन्वय ही उस आदर्श समाज की कल्पना करता है, जहां सत्य का मार्ग, कल्याण की भावना और सौंदर्य की अनुभूति एक साथ विकसित होती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने स्थापना काल से ही इन मूल्यों को अपने कार्य का आधार बनाया है। संघ का मानना है कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक या आर्थिक प्रगति से संभव नहीं, बल्कि इसके लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति में चरित्र, संस्कार और कर्तव्यबोध का विकास आवश्यक है। व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज और राष्ट्र को सुदृढ़ बनाना ही संघ की कार्यप्रणाली का मूल तत्व रहा है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि संघ का मूल उद्देश्य समाज और राष्ट्र जीवन में ‘सत्यम्, शिवम्, सुंदरम्’ की स्थापना करना है। नागपुर के रेशम बाग स्थित श्री केशव स्मृति मंदिर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह विचार व्यक्त किए। यह अवसर संघ के घोष पथक के इतिहास पर आधारित हस्तलिखित ग्रंथ ‘राष्ट्र स्वराधना’ के विमोचन का था। अपने संबोधन में मोहन भागवत ने संघ की 100 वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन ने कभी किसी की कृपा की अपेक्षा नहीं की और न ही किसी की अवहेलना उसके मार्ग में स्थायी बाधा बन सकी।

उन्होंने कहा कि संघ का कार्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना और राष्ट्र जीवन को नैतिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों से समृद्ध करना है। संघ की कार्यप्रणाली व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज निर्माण पर आधारित है, जहां अनुशासन, सेवा और समर्पण को प्राथमिकता दी जाती है। अपने उद्बोधन में उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संघ का मार्ग आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास पर आधारित रहा है। अनेक चुनौतियों और विरोधों के बावजूद संगठन निरंतर आगे बढ़ता रहा और आज भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

स्वयंसेवकों के परिश्रम से संघ आज देश का दिशा दर्शन करने वाली ताकत बन चुका है। इसके बावजूद इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज कराने की संघ की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। वह अपने सभी कार्यों का श्रेय पूरे समाज को देना चाहता है। मोहन भागवत ने ‘राष्ट्र स्वराधना’ ग्रंथ को संघ के स्वयंसेवकों के लिए उपयोगी बताते हुए कहा कि इस ग्रंथ को पढ़ कर वे यह जान सकेंगे कि संघ ने पिछले 100 सालों में क्या किया है और आगे  क्या करना चाहिए। संघ प्रमुख ने स्वयंसेवकों के परिश्रम की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने संघ की विचारधारा के अनुरूप राष्ट्रनिर्माण में समर्पित भाव से अपनी पूरी शक्ति लगाई है। इससे यह स्पष्ट है कि संघ केवल एक संगठन नहीं है बल्कि विचारधारा है जिसका मूल उद्देश्य समाज एवं राष्ट्र की सेवा करना है।मोहन भागवत ने कहा कि संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष को उत्सव के आयोजन नहीं बल्कि आत्मावलोकन के अवसर के रूप में देखना चाहिए।  हमें पूर्वजों का स्मरण करते हुए और अधिक उन्नत स्थिति की ओर आगे बढने का प्रयास करना है। पूर्वजों के द्वारा किए गए कार्यों को सुरक्षित रखते हुए उन्हें आगे बढाना स्वयंसेवकों की जिम्मेदारी है।संघ प्रमुख ने समाज को संगठित करने के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु और अधिक संगठित और व्यापक प्रयास किए जाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए इसमें समाज की भी सहभागिता के महत्व को रेखांकित किया।

संघ प्रमुख ने घोष दल के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोष दल में विभिन्न वाद्य यंत्र होते हैं जिनके स्वर एवं ध्वनि अलग अलग होते हुए भी स्वयं सेवक एक ही ताल पर चलते हैं। इससे समन्वय एवं एकता की भावना मजबूत होती है। जब कोई कार्य मन से एवं पूरी निष्ठा के साथ किया जाता है तो उसका परिणाम भी उसी रूप में प्रकट होता है और सत्य ं शिवं सुंदरम् की अनुभूति होती है।मोहन भागवत ने अपनी इस बात को रेखांकित किया कि समाज और राष्ट्र  में सत्यं शिवं सुंदरम् की स्थापना ही संघ का उद्देश्य है। सरसंघचालक ने कहा कि  संघ के सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य संस्कारों का निर्माण करना है। सुदृढ़ शरीर और संस्कारित मन के समन्वय से गुणवत्ता पूर्ण जीवन की ओर आगे बढ़ना ही लक्ष्य है। इस दृष्टि से ‘राष्ट्र स्वराधना’ का हस्तलिखित इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण है।

समय बीत जाता है, कार्य खड़ा हो जाता है परन्तु मौलिक गुणवत्ता शुरुआत में थी उसे अंत तक बनाए रखना महत्वपूर्ण है। हमने विकट परिस्थिति में कार्य कैसे खड़ा किया और किस उद्देश्य से किया उसका सदैव स्मरण कराने का कार्य यह ग्रंथ करेगा। संघ प्रमुख ने कहा कि स्वयंसेवक पेशेवर गायक या वादक नहीं होते लेकिन अपने दैनिक कार्यों को संभालते हुए, बिना कागज सामने रखे इतनी सुंदर रचनाएं कैसे प्रस्तुत कर लेते हैं इस पर लोगों को आश्चर्य होता है परन्तु चमत्कार करना संघ का उद्देश्य नहीं होता ।वह तो अपने आप घटित हो जाता है। पूर्व स्वयं सेवकों के सद्गुण इन रचनाओं में मिलते हैं और दिखाई देते हैं। भाव तभी उत्पन्न होता है जब वादक पूरे मन से वादन करता है। इसे केवल एक कर्तव्य नहीं बल्कि अंतरात्मा से जुड़ी हुई बात समझ कर करना चाहिए।

“वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना आज के वैश्विक परिदृश्य में और भी प्रासंगिक हो गई है। जब दुनिया अनेक प्रकार के संघर्षों, विभाजनों और असमानताओं से जूझ रही है, तब यह विचार मानवता को एक सूत्र में बांधने का मार्ग दिखाता है। वहीं “सत्यम् शिवम् सुंदरम्” का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि विकास केवल भौतिक न होकर नैतिक और आध्यात्मिक आधार पर भी टिका हो।

संघ का दृष्टिकोण यह है कि एक सशक्त और समृद्ध भारत ही विश्व कल्याण में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकता है। इसलिए वह समाज में सेवा, समरसता और संस्कार के माध्यम से एक ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहता है, जहां हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो और राष्ट्र के प्रति समर्पित भाव से कार्य करे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इन मूल्यों को केवल विचारों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण और जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। जब समाज का हर वर्ग “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को अपनाते हुए “सत्यम् शिवम् सुंदरम्” की ओर अग्रसर होगा, तभी एक ऐसे भारत का निर्माण संभव होगा, जो न केवल अपने लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रेरणा स्रोत बने।

(लेखक बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।)

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