TMC नाम और चुनाव चिन्ह विवाद: ममता गुट ने EC को भेजे नए नाम और सिंबल

TMC Name and Election Symbol Dispute: Mamata Faction Sends New Names and Symbols to EC
( File Photo, Pic credit: Twitter)

चिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर जारी विवाद के बीच ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने चुनाव आयोग को नए नाम और चुनाव चिन्ह के विकल्प भेज दिए हैं। चुनाव आयोग ने आगामी उपचुनावों तक दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फूल-घास’ के आरक्षित चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से अस्थायी रूप से रोक दिया है।

सूत्रों के मुताबिक, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी ने गुरुवार रात 11:36 बजे ईमेल के जरिए चुनाव आयोग को अपनी पसंद के नाम और चुनाव चिन्ह भेजे। पार्टी ने ये विकल्प ‘कड़े विरोध’ के साथ सौंपे हैं।

आयोग का यह अंतरिम आदेश 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनावों पर लागू होगा।

ममता गुट ने आदेश को नहीं माना, लेकिन विकल्प भेजे

ममता बनर्जी के करीबी और TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने चुनाव आयोग के आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा कि पार्टी इस फैसले को स्वीकार नहीं करती। उन्होंने कहा, “यह आदेश कानून के विपरीत है। इसमें कई कानूनी कमियां हैं, इसलिए हम इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। आदेश में तथ्यों को सही तरीके से नहीं रखा गया है। लेकिन कभी-कभी अस्थायी अवधि के लिए आपको ऐसी चीजों को भी स्वीकार करना पड़ता है, जो नियमों और कानून के अनुरूप नहीं होतीं।”

यानी ममता गुट ने आदेश पर विरोध दर्ज कराने के बावजूद उपचुनाव को देखते हुए आयोग की ओर से मांगे गए वैकल्पिक नाम और चुनाव चिन्ह उपलब्ध करा दिए हैं।

दूसरी ओर, रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने चुनाव आयोग की अंतरिम व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है। इस गुट के नेता और TMC विधायक अखरुज्जमान अंसारी ने कहा कि उनका गुट आयोग के आदेश का पालन करेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि अंतिम फैसला आने के बाद पार्टी का मूल नाम और चुनाव चिन्ह वापस मिल जाएगा।

चुनाव आयोग के मुताबिक, उसके सामने दो ऐसे प्रतिद्वंद्वी गुट हैं जो खुद को ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर फैसला करने के लिए Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत प्रक्रिया शुरू करना जरूरी हो गया।

अंतिम फैसला आने तक किसी भी गुट को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम या आरक्षित ‘फूल-घास’ चुनाव चिन्ह का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं होगी। आयोग ने दोनों गुटों से तीन-तीन वैकल्पिक नाम प्राथमिकता के क्रम में देने और अपने उपलब्ध चुनाव चिन्हों की सूची में से प्रतीक चुनने को कहा था। प्रस्तावित नामों में मूल पार्टी से जुड़ा संदर्भ बनाए रखने की अनुमति भी दी गई है।

आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था केवल आगामी उपचुनावों के लिए है और पार्टी के नाम तथा चुनाव चिन्ह पर अंतिम फैसला होने तक लागू रहेगी।

BJP ने TMC पर साधा निशाना

इस पूरे विवाद को लेकर बीजेपी ने TMC पर हमला बोला है। पार्टी के राज्य प्रवक्ता देबजीत सरकार ने कहा कि TMC को मौजूदा स्थिति का सामना करना ही चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 15 वर्षों में पश्चिम बंगाल की जनता के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, उसका यह जवाब है। हालांकि, ये बीजेपी नेता के राजनीतिक आरोप हैं और चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश में ऐसे आरोपों पर कोई निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होने के बाद की थी। पार्टी का ‘फूल-घास’ चुनाव चिन्ह उसकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। पार्टी नेताओं के मुताबिक, इस चिन्ह को ममता बनर्जी ने खुद बनाया था। इसमें दो फूलों को सामाजिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता से जोड़कर देखा गया। करीब 28 साल के राजनीतिक सफर में यही चिन्ह TMC की पहचान बन गया। लेकिन चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश के चलते 6 अक्टूबर के नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव में दोनों गुट इस चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।

कैसे शुरू हुआ TMC में विद्रोह?

पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद की जड़ विधानसभा चुनाव में हार के बाद शुरू हुए संगठनात्मक विद्रोह में बताई जा रही है। यह बगावत पहले TMC विधायक दल तक सीमित रही और बाद में संसद तक पहुंच गई।

जून में 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता रितब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया। उन्होंने ममता गुट के उम्मीदवार सोवन्देब चट्टोपाध्याय के बजाय रितब्रत का समर्थन किया। विधानसभा अध्यक्ष की ओर से इस व्यवस्था को मान्यता मिलने के बाद TMC के 28 साल के इतिहास में पहली बार पार्टी के भीतर औपचारिक विभाजन सामने आया।

इसके करीब पांच दिन बाद विवाद संसद तक पहुंच गया। वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 20 लोकसभा सांसदों ने कथित तौर पर नए बने NCPI के साथ मिलकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखा और खुद को बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA के समर्थन वाले ‘अलग गुट’ के रूप में पेश किया। इन घटनाओं के बाद TMC के विधानसभा और संसदीय संगठन में विभाजन और गहरा गया। आखिरकार पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच गया। अब नजर चुनाव आयोग के अंतिम फैसले पर है। फिलहाल दोनों गुटों को आगामी उपचुनावों में अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरना होगा।

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