क्या है खौलते तेल में हाथों से तले जाते पकौड़े का राज

शिवानी सिंह ठाकुर

नई दिल्ली: सावन, यानी बारिश का मौसम दस्तक देना शुरू कर चुका है, ऐसे में हम भारतीयों को जो सबसे ज्यादा भाता है वो है हमारा पसंदीदा  स्नैक्स, पकौड़े। बारिश के मौसम में चाय के साथ गरमा गरम पकोड़े हो जाए तो मजा ही आ जाए।

पकौड़े कई तरह के होते हैं, लोग इन्हें घर और बाहर कई जगह बनाते हैं।स्ट्रीट फूड में तो जैसे इनकी भरमार ही है, पूरब की फ्राई मोमोज हो या पश्चिम के बड़ा-पाव, नॉर्थ के तो पकौड़े  की गिनती ही क्या, आलू हो या गोभी, पालक हो या फिश फ्राय।कई बार इन्हें गरमा-गरम खाने के चक्कर में हमारे  मुँह भी जल जाते हैं, पर हमारे देश में कई ऐसे महारथी हैं जो पकौड़ों के लिए फायर प्रूफ है।

जी हाँ, वो प्रयागराज के रामबाबू हों, म.प्र के जबलपुर से देव मंगौड़े वाले, या दिल्ली के करोल बाग के गणेश रेस्टोरेंट के  70 साल के प्रेम सिंह, ये सभी अपने खुले हाथों से पकौड़े  तलते हैं, ये 120 डिग्री सेंटीग्रेड से भी ज्यादा गर्म तेल में अपने हाथों से पकौड़े तल लेते  हैं जबकि 1 सेकंड के लिए 70 डिग्री सेंटीग्रेड ही काफी है हमारी त्वचा को जलाने के लिए।तो क्या यह जादू है चमत्कार है या ये  वाकई में फायरप्रूफ हैं।

यह एक साइंटिफिक फिनोमेना है जिसे  “लेडेन- फ्रॉस्ट” प्रभाव कहते हैं। इसे 1751 में जोहान गोटलाब लेडेनफ्रॉस्ट (Johann Gottlob Leidenfrost ) ने अपनी एक किताब  –  एक पथ आम जल के कुछ गुण के बारे में (A Tract About Some Qualities of Common Water ) में वर्णन किया है। यह एक भौतिक घटना है जिसमें एक तरल, एक सतह के करीब जो कि तरल की ब्यालिंग प्वाइंट की तुलना में काफी गर्म होता है, एक इंसुलेटेड भाप की परत पैदा करता है, जो दोनों सतहों के बीच बैरियर का काम करती है।

इस प्रभाव के बहुत सारे उदाहरण है जो कि हमारे  घरेलू किचन से लेकर  बाहर खतरनाक उबलते लेड  एक्सपेरिमेंट में  देखे जा सकते हैं।इसकी सबसे उम्दा और आसान उदाहरण अपने किचन में देख सकते हैं।अगर हम तवे को लेडेन फार्स्ट पॉइंट  तक गर्म करते हैं तो पानी की बूंदे उस पर  भाप बनकर उड़ने के बजाय  नाचती दिखती हैं   ऐसा पानी और तवे के बीच में  वाष्प  की एक परत बनने से होती हैं  जो की बूंदों को अलग दिशाओं में भेजती हैं।

भाप की थर्मल कंडक्टिविटी तवे के मेटल की कंडक्टिविटी से बहुत कम होती है इसीलिए हीट ट्रांसफर धीमी  हो जाती है और पानी की बूंदे तवे पर भाप की परत पर तैरने लगती हैं।यह बूंदे निश्चय ही भाप बन जाएंगी लेकिन सामान्य से कुछ अधिक समय लेंगी। यह उचित और अपने आप में पूर्ण उदाहरण है लेडेन फ्रास्टॅ का, पर आइए कुछ हटके और मनोरंजक भी देखते हैं।जैसे कि पिघले हुए लेड मे या लिक्विड नाइट्रोजन में हाथ डालना।दोनों लेडेन फ्रॉस्ट इफेक्ट  का कारनामा है।तरल नाइट्रोजन वाले एक्सपेरिमेंट में हमारा  हाथ वो गर्म सतह है|


यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के दो स्टूडेंट्स ने इस प्रभाव के नॉलेज का उपयोग कर  लेडेनफर्स्ट मेज बनाया  जिसमें पानी की बूंदे उभरे खुरदरे गर्म सतह पर  सीधी दिशा में जाती है जिसका तापमान  कंट्रोल कर हम दिशा  कंट्रोल कर सकते हैं| गर्म तेल में हाथ डालकर पकौड़े तलते समय भी यही प्रभाव काम में आता है।पकौड़े  के बैटर में डूबी हुई उंगलियां इंसुलेशन की परत देती है।पर यह सिर्फ इसी पर  नहीं  उन दुकानदारों की फुर्ती के साथ-साथ टाइमिंग पर भी निर्भर है और सालों  का अभ्यास उन्हें आत्मविश्वास देता है कि वह झटके से कर जाते हैं।  लेडेन फ्रॉस्ट प्रभाव  उनकी कला है|
ये इक  करिश्माई  प्रभाव  की तरह है जिस पर  साइंस और  फिक्शन के जनक जूल्स वर्न (Juls Verne)  ने अपनी  एक बेहतरीन किताब (Michael Strogoff: The Courier of Czar )  बेस्ड  कर लिखी।जिसमें नायक की  आंखें गर्म तलवार से अंधे होने से उसकी  आंसुओं के भाप  की वजह से बच गई।इसके बारे में फिर कभी..

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