लॉकडॉउन में शराब की दुकान खोलना क्यों जरूरी था?

शिवानी  रजवारिया

नई दिल्ली: पूरे देश में लॉकडाउन के चलते आम से खास सभी लोग किसी ना किसी तरह की मुश्किलों का सामना कर रहे हैं, जमीनी स्तर पर समस्याएं ज्यादा है और सुविधाएं कम ऐसे में सरकार के लिए भी यह चुनौतीपूर्ण समय है। आम भाषा में कहा जाए तो यही वो समय है जो सबकी पोल पट्टी भी खोलेगा। विपक्ष का कटाक्ष और आम जनता का भरोसा दोनों ही चुनौती से भरे हैं।

ऐसे में सबसे पहले सरकार को ही सवालों के घेरे में लिया जाता है। सवाल पूछा जाना भी जरूरी है और जवाब देना भी। देश की बागडोर संभालने वाले राजनेता ही जवाबदेही जिम्मेदारी नहीं लेंगे तो आम नागरिक खुद को अनाथ ही महसूस करेगा। जिस तरह लॉकडॉउन 3।0 के पहले दिन तमाम राज्यों में शराब की दुकानों पर लगी किलोमीटर लंबी लाइनों ने सोशल डिस्टेंसिंग पर पानी फेरा उससे राज्य की व्यवस्था और सुरक्षा दोनों पर सवाल खड़ा हो गया साथ ही साथ गृह मंत्रालय द्वारा जारी गाइडलाइंस पर भी जनता के सवाल सामने आने लगे।
यह सर्वव्यापी है कि इस बीमारी से बचने का एकमात्र उपाय हैं सोशल डिस्टेंसिंग, तभी हम इससे छुटकारा पा सकते हैं। हम सभी यह बात बहुत अच्छे से जानते हैं और हमारी सरकारें भी, उसके बावजूद जब ऐसी घटनाएं व लापरवाही सामने आती हैं तो देश के बुद्धिजीवियों का सवाल करना जरूरी हो जाता हैं।

पहला सवाल: शराब की दुकान खोलना क्यों जरूरी था?
दरअसल शराब और पेट्रोल ऐसे दो उत्पाद हैं जो सरकारों की डूबती अर्थव्यवस्था को पार लगाने का काम करते हैं। इन दोनों उत्पादों पर राज्य सरकारें अपनी जरूरत के अनुसार एक्सरसाइज टैक्स लगाती हैं यानी राजस्व वसूला जाता है। इस समय देश में जो हालात चल रहे हैं उन्हें देखते हुए राज्य सरकारों ने अपने राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए यह कदम उठाया है लेकिन सवाल यह उठता है यदि ऐसा करना जरूरी था तो सोशल डिस्टेंसिंग का सख्ती से पालन क्यों नहीं कराया गया।

दूसरा सवाल: सरकार को शराब से कितना फायदा होता है?
उत्तर प्रदेश के आबकारी मंत्री नरेश अग्निहोत्री के अनुसार उत्तर प्रदेश राज्य में शराब की बिक्री बंद होने से प्रतिमाह 3000 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हो रहा है। दरअसल शराब को जीएसटी लिस्ट से बाहर रखा गया है और राज्य सरकारें अपनी जरूरत के अनुसार शराब पर कर लगाती है और ज्यादा से ज्यादा राजस्व वसूलने का काम करती हैं। ज्यादातर राज्यों के कुल राजस्व का 15 से 30 फीसदी हिस्सा शराब की दुकानों से ही आता है सभी सरकारी अपने अपने हिसाब से अपने अपने राज्यों में इस कर को बढ़ाती रहती हैं।

शराब की बिक्री से साल 2019- 20 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 26000 करोड़ महाराष्ट्र को 24000 करोड़ तेलंगना को 21500 करोड़, कर्नाटक को 20,248 करोड़,पंजाब को 11,874 करोड़,राजस्थान को 7,800 करोड़ पंजाब को 5,600 करोड़ और दिल्ली को 5,500 करोड़ का राजस्व हासिल किया था। बिहार और गुजरात में शराब पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है।

तीसरा सवाल: सोशल डिस्टेंसिंग का सख्ती से पालन क्यों नहीं किया गया?

लॉकडॉउन 3 के पहले दिन ऑरेंज और ग्रीन जोन में आए इलाकों को लॉकबंदी से नियमों के तहत राहत दी गई। धीरे-धीरे बाजार खुला, दुकानें खुली सुनसान सड़कों पर गाड़ियों का शोर दिखा और ट्राफिक का जोर दिखा। वहीं एक ऐसी कतार दिखी जिसने सबका ध्यान अपनी और आकर्षित कर लिया। शराब की दुकानों पर लगी लंबी-लंबी लाइने। राज्य सरकारों से मिली राहत में शराब की दुकान को खुलने का भी आदेश दिया गया लेकिन खुलने के बाद जो हुआ वह हैरान कर देने वाला था ।
यूपी के आबकारी मंत्री नरेश अग्निहोत्री का कहना है कि सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखा गया है। इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते कि नियमों का पालन नहीं किया गया। उनके अनुसार सभी ठेकों के बाहर पुलिस तैनात थी सवाल यह है सभी ठेकों के बाहर पुलिस तैनात थी तो फिर ऐसी तस्वीरें सामने क्यों आईं जिन्हें देखकर लोग हैरान रह गए और डिस्टेंसिंग की धज्जियां उड़ती दिखाई दी वहीं कुछ राज्यो में दुकानों के बाहर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए शराब की बिक्री की गई।।

चौथा सवाल: क्या लॉकडॉउन का खुलना खतरे से खाली है?
जिस तरीके से अभी भी कोरोना वायरस से संक्रमित केसेस की संख्या सामने आ रही है ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है क्या सरकार का लॉकबंदी को खोलने का कदम खतरे के बढ़ने का इशारा तो नहीं होगा?

अनुमान के अनुसार प्रदेश में 1 दिन में 300 करोड़ रुपए की शराब की बिक्री बताई जा रही है। राजधानी लखनऊ में आठ करोड़ की शराब की बिक्री का अंदाजा लगाया जा रहा है वही बाकी राज्यों में लगभग 5 करोड तक यह आंकड़ा पहुंचा है।
जहां देश का हर नागरिक इस मंदी की और बेरोज़गारी  की मार को झेल रहा है वहां एक सवाल यह भी खड़ा हो जाता है कि क्या लोगों के पास इस जहर को खरीदने के लिए पैसा है? ऐसे में उन लोगों का पिसना सामान्य सी बात हो जाती है जो ना तो अप्पर क्लास की जिंदगी जीते हैं और ना ही लोअर क्लास की।

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