पंजाब में बदलेगा सियासी समीकरण? BJP-अकाली दल गठबंधन से AAP की बढ़ सकती है मुश्किल
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मिली चुनावी सफलता से उत्साहित भारतीय जनता पार्टी (BJP) अब पंजाब की सियासत में भी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक, अगले साल की शुरुआत में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में BJP एक बार फिर शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ गठबंधन कर मैदान में उतर सकती है। गठबंधन को लेकर एक दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है, जबकि सीटों के बंटवारे और संभावित विधानसभा क्षेत्रों पर चर्चा के लिए दूसरे दौर की बातचीत जल्द शुरू होने की संभावना है।
BJP के रणनीतिकारों का मानना है कि अकाली दल के साथ तालमेल दोनों दलों के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है। पंजाब की बहुकोणीय लड़ाई में अगर दोनों पार्टियां अपने वोट बैंक को एक साथ लाने में सफल रहती हैं, तो सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) के सामने मजबूत चुनौती पेश की जा सकती है। हालांकि, इसके लिए BJP और अकाली दल दोनों को अपने मौजूदा जनाधार से आगे बढ़कर अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।
लोकसभा के आंकड़ों ने बढ़ाई गठबंधन की उम्मीद
गठबंधन की संभावनाओं के पीछे BJP लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को अहम आधार मान रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में BJP और अकाली दल ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। BJP भले ही पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से एक भी नहीं जीत सकी, लेकिन उसे 18.56 प्रतिशत वोट मिले। वहीं, अकाली दल को 13.42 प्रतिशत वोट मिले और वह एक सीट जीतने में सफल रहा। दोनों दलों का वोट शेयर जोड़ें तो यह करीब 32 प्रतिशत बैठता है।
BJP का आकलन है कि अगर दोनों दल एक साथ चुनाव लड़ते हैं और इस संयुक्त वोट बैंक में कुछ अतिरिक्त समर्थन जोड़ने में सफल रहते हैं, तो AAP के खिलाफ मुकाबला काफी कड़ा हो सकता है। पार्टी राज्य सरकार के खिलाफ कथित एंटी-इंकम्बेंसी को भी अपने पक्ष में भुनाने की रणनीति पर काम कर रही है।
विधानसभा चुनाव के आंकड़े हालांकि अलग तस्वीर पेश करते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में अकाली दल को 18.38 प्रतिशत वोट के साथ सिर्फ 3 सीटें मिली थीं, जबकि BJP को 6.60 प्रतिशत वोट के साथ 2 सीटों पर जीत मिली थी। यानी लोकसभा चुनाव में BJP का वोट शेयर विधानसभा चुनाव की तुलना में लगभग तीन गुना रहा। यही वजह है कि संभावित गठबंधन की स्थिति में BJP पहले की तुलना में ज्यादा विधानसभा सीटों पर दावा कर सकती है।
38 सीटों पर BJP-अकाली दल की मजबूत मौजूदगी का दावा
लोकसभा चुनाव के विधानसभा-वार प्रदर्शन को देखें तो BJP ने 23 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई थी, जबकि अकाली दल 9 क्षेत्रों में आगे रहा। इसके अलावा BJP करीब 17 विधानसभा क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर रही और अकाली दल 14 सीटों पर रनर-अप रहा।
BJP के मुताबिक, उसने पांच विधानसभा क्षेत्रों में 5,000 से कम वोटों के अंतर से और 10 सीटों पर 10,000 से कम वोटों के अंतर से चुनाव गंवाया। इस आधार पर पार्टी का दावा है कि अकेले BJP ने राज्य की करीब 38 विधानसभा सीटों पर मजबूत चुनावी स्थिति दिखाई थी। अकाली दल के साथ वोटों का तालमेल होने पर यह आधार और मजबूत हो सकता है।
पुराना गठबंधन, पुराना चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड
BJP और अकाली दल के बीच गठबंधन कोई नया प्रयोग नहीं है। दोनों दल 1996 से 2020 तक लंबे समय तक साथ रहे। इस दौरान गठबंधन ने पंजाब में कई अहम चुनावी जीत दर्ज कीं।
1997 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल ने 75 और BJP ने 18 सीटें जीतकर बड़ी जीत हासिल की। 2007 में अकाली दल को 49 और BJP को 19 सीटें मिलीं। इसके बाद 2012 में गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचा। उस चुनाव में अकाली दल ने 56 और BJP ने 12 सीटों पर जीत दर्ज की।
यही चुनावी इतिहास मौजूदा दौर में दोनों दलों के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक संदर्भ है। हालांकि, 2026 का पंजाब 1990 या 2000 के दशक वाला पंजाब नहीं है। AAP का उदय, कांग्रेस का आधार, BJP का बढ़ता प्रभाव और अकाली दल की बदली हुई राजनीतिक स्थिति—इन सभी के बीच पुराने समीकरणों को दोहराना आसान नहीं होगा।
BJP की रणनीति: AAP सरकार पर हमला और अपना मॉडल पेश करना
संभावित गठबंधन के साथ BJP ने AAP सरकार के खिलाफ मुद्दों की एक विस्तृत सूची तैयार करनी शुरू कर दी है। पार्टी का फोकस भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलता, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक न्याय और चुनावी वादों को लेकर सरकार को घेरने पर होगा।
BJP का आरोप है कि भ्रष्टाचार खत्म करने के वादे के साथ सत्ता में आई AAP सरकार इस मोर्चे पर अपेक्षित बदलाव नहीं ला सकी। पार्टी भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों पर हुई कार्रवाई, तत्कालीन मंत्री विजय सिंगला को हटाए जाने और विधायक रमन अरोड़ा से जुड़े मामले को अपने हमले का आधार बना रही है।
BJP यह आरोप भी लगाती रही है कि पंजाब सरकार के कामकाज में दिल्ली का प्रभाव जरूरत से ज्यादा है। हालांकि, इन आरोपों पर AAP का पक्ष इस विश्लेषण में शामिल नहीं है और इन दावों को राजनीतिक आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
स्वास्थ्य और शिक्षा भी BJP के निशाने पर
BJP पंजाब में स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को भी बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी के मुताबिक, राज्य में प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट रेट 2.5 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 0.3 प्रतिशत से काफी अधिक है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में BJP का दावा है कि पंजाब के 3,699 स्वास्थ्य केंद्रों में से केवल 52.5 प्रतिशत ही ‘Indian Public Health Standards’ को पूरा करते हैं। जिला अस्पतालों में महज 4.3 प्रतिशत और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 4.9 प्रतिशत संस्थान निर्धारित राष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरते हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में यह आंकड़ा 15.7 प्रतिशत बताया गया है।
शिक्षा के मोर्चे पर BJP सरकारी स्कूलों में शिक्षक पदों की बड़ी संख्या में रिक्तियों को मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी यह सवाल भी उठा रही है कि 16 मेडिकल कॉलेज स्थापित करने के वादे के बावजूद अब तक एक भी नया मेडिकल कॉलेज स्थापित नहीं किया गया।
केंद्र की योजनाओं को चुनावी नैरेटिव में बदलने की तैयारी
AAP सरकार को घेरने के साथ BJP केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पंजाब को दी गई आर्थिक सहायता और केंद्रीय योजनाओं को भी चुनावी मुद्दा बनाएगी।
BJP के मुताबिक, PM-KISAN के तहत पंजाब के करीब 18 लाख किसानों को 7,596.84 करोड़ रुपये की सहायता दी गई। MGNREGA के तहत ग्रामीण विकास और 8.14 लाख व्यक्ति-दिवस के रोजगार के लिए 8,144.11 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
इसी तरह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रामीण सड़कों और पुलों के लिए 1,722.68 करोड़ रुपये, जबकि स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के लिए 359.56 करोड़ रुपये दिए जाने का BJP दावा कर रही है।
जल जीवन मिशन के तहत 32 लाख घरों में नल से पानी पहुंचाने और अमृत सरोवर मिशन के तहत 816 जल निकाय विकसित किए जाने को भी पार्टी अपने चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बना सकती है। रेलवे और एयरपोर्ट परियोजनाओं में केंद्र के सहयोग को भी BJP प्रमुखता से सामने लाने की तैयारी में है।
‘फ्रीबी’ बनाम रोजगार और विकास का मॉडल
BJP की संभावित चुनावी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा पंजाब की अर्थव्यवस्था को लेकर उसका वैकल्पिक मॉडल हो सकता है। पार्टी मुफ्त योजनाओं की राजनीति के बजाय रोजगार, निवेश और संपत्ति निर्माण पर जोर देने वाला मॉडल पेश करने पर विचार कर रही है।
महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता और नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना जैसे वादे भी संभावित घोषणाओं का हिस्सा हो सकते हैं। साथ ही BJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती पंजाब की Panthic यानी सिख धार्मिक-सामुदायिक भावनाओं के साथ सामाजिक विश्वास कायम करना होगी।
असली मुकाबला गठबंधन से आगे
कागज पर BJP और अकाली दल का संभावित गठबंधन मजबूत नजर आता है। लोकसभा चुनाव के संयुक्त वोट शेयर, विधानसभा क्षेत्रों में दोनों दलों की मौजूदगी और पुराने गठबंधन का इतिहास इसके पक्ष में जाता है। लेकिन चुनावी राजनीति केवल वोट जोड़ने का गणित नहीं है।
BJP को अपने बढ़ते शहरी और गैर-अकाली समर्थन को बनाए रखते हुए ग्रामीण पंजाब में भी स्वीकार्यता बढ़ानी होगी। दूसरी ओर अकाली दल को अपने पारंपरिक सिख और ग्रामीण आधार को फिर से सक्रिय करना होगा। दोनों दलों के बीच सीट बंटवारा भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा।
इसलिए पंजाब में BJP की रणनीति दोहरी दिखाई देती है, एक तरफ AAP सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी माहौल को धार देना और दूसरी तरफ BJP-अकाली दल गठबंधन को विकास, रोजगार और सामाजिक-धार्मिक विश्वास के वैकल्पिक मॉडल के रूप में पेश करना। अगर दोनों पार्टियां अपने वोट ट्रांसफर कराने में सफल होती हैं, तो पंजाब की बहुकोणीय लड़ाई का चुनावी गणित निश्चित तौर पर बदल सकता है।
