विंबलडन 2026: मां की याद में छलक पड़े लिंडा नोस्कोवा के आंसू, पहला ग्रैंड स्लैम खिताब किया समर्पित

चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: विंबलडन 2026 का महिला एकल खिताब जीतने के बाद सेंटर कोर्ट पर जब लिंडा नोस्कोवा घुटनों के बल बैठीं, तो वह सिर्फ जीत का जश्न नहीं था, बल्कि वर्षों के संघर्ष, त्याग और एक अधूरे रिश्ते की भावनाओं का विस्फोट था। 21 वर्षीय चेक खिलाड़ी ने अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब अपनी दिवंगत मां इवाना नोस्कोवा को समर्पित किया, जिनका 2024 में कैंसर से लंबी जंग के बाद विंबलडन शुरू होने से ठीक पहले निधन हो गया था।
सेंटर कोर्ट पर खेले गए रोमांचक ऑल-चेक फाइनल में नोस्कोवा ने अपनी हमवतन और करीबी दोस्त कैरोलिना मुचोवा को 6-2, 5-7, 6-3 से हराकर इतिहास रच दिया। इस जीत के साथ वह प्रतिष्ठित वीनस रोज़वॉटर डिश जीतने वाली छठी चेक महिला बनीं।
ट्रॉफी समारोह के दौरान भावनाओं पर काबू पाना नोस्कोवा के लिए आसान नहीं था। ट्रॉफी हाथ में लेने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपनी मां को याद किया, जिनकी प्रेरणा और विश्वास ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।
उन्होंने भावुक होकर कहा, “एक और शख्स हैं, जिन्हें मैं धन्यवाद कहना चाहती हूँ और वो हैं मेरी मां। उनके बिना मैं आज यहां कभी नहीं होती। यह जीत उन्हीं के नाम है। धन्यवाद।”
इसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी नोस्कोवा अपनी भावनाएं नहीं छिपा सकीं। उन्होंने कहा कि पिछले दो हफ्तों की हर याद अब हमेशा उनके दिल में रहेगी।
“मैं आमतौर पर रोती नहीं हूं, लेकिन आज खुद को रोक नहीं पाई। इन दो हफ्तों का हर पल मेरे लिए बेहद खास रहा। चाहे खुशी के आंसू हों या दर्द के, इस सफर में जितनी मेहनत, पसीना और संघर्ष लगा, वह सब आज सफल हो गया। मैं इन दो हफ्तों को कभी नहीं भूलूंगी।“
2024 में मां इवाना के निधन ने नोस्कोवा को गहरा झटका दिया था। उस कठिन दौर से उबरना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने उसी दर्द को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। पूरे विंबलडन अभियान के दौरान उनकी सपोर्ट टीम और परिवार हर कदम पर उनके साथ खड़े रहे और मां की याद हमेशा उनके दिल में रही।
फाइनल में दिखाया जज्बा और मानसिक मजबूती
फाइनल की शुरुआत से ही नोस्कोवा पूरी तरह हावी रहीं। दमदार सर्विस और आक्रामक ग्राउंडस्ट्रोक के दम पर उन्होंने पहला सेट महज आधे घंटे से भी कम समय में 6-2 से अपने नाम कर लिया।
दूसरे सेट में भी उन्होंने 5-2 की बढ़त बना ली और खिताब जीतने से सिर्फ एक गेम दूर थीं। उनके पास पाँच चैंपियनशिप पॉइंट भी थे, लेकिन अनुभवी मुचोवा ने शानदार वापसी करते हुए सभी मौके बचा लिए और लगातार पाँच गेम जीतकर दूसरा सेट 7-5 से अपने नाम कर लिया।
हालांकि, निर्णायक सेट में नोस्कोवा ने बेहतरीन मानसिक मजबूती दिखाई। उन्होंने शुरुआत में ही सर्विस ब्रेक हासिल कर लिया और फिर पूरे सेट में मुकाबले पर अपनी पकड़ बनाए रखी। मुचोवा ने वापसी की कोशिश जरूर की, लेकिन इस बार नोस्कोवा कोई गलती करने के मूड में नहीं थीं।
जब मुचोवा का आखिरी बैकहैंड कोर्ट से बाहर चला गया, तो नोस्कोवा खुशी से घास पर गिर पड़ीं। इसके बाद दोनों खिलाड़ियों ने नेट पर एक-दूसरे को गले लगाया। करीबी दोस्त और पेरिस ओलंपिक में डबल्स पार्टनर रह चुकीं इन दोनों खिलाड़ियों ने विंबलडन के इतिहास का पहला ऑल-चेक महिला फाइनल यादगार बना दिया।
इस जीत के साथ नोस्कोवा 2011 में पेट्रा क्वितोवा के बाद सबसे कम उम्र की विंबलडन महिला चैंपियन बन गईं। पूरे टूर्नामेंट में उन्होंने शानदार खेल दिखाया, जिसमें तीसरे दौर में मैच पॉइंट बचाकर वापसी करना भी शामिल रहा। यह उनके करियर का तीसरा डब्ल्यूटीए खिताब और पहला ग्रैंड स्लैम खिताब है।
विंबलडन की इस ऐतिहासिक जीत ने साफ कर दिया है कि लिंडा नोस्कोवा अब सिर्फ भविष्य की स्टार नहीं, बल्कि महिला टेनिस की नई चैंपियन बन चुकी हैं। उनकी सफलता की इस कहानी में प्रतिभा, संघर्ष, साहस और मां की याद—चारों का अद्भुत संगम देखने को मिला।
