क्या स्वदेशी का नारा कोचों पर भी लागू होगा?

राजेंद्र सजवान

कोरोना वायरस  से निपटने के बाद देश में खेलों का माहौल कब तक बन पाएगा, कहना मुश्किल है, क्योंकि वैज्ञानिकों और डाक्टरों की मानें तो यह वायरस सालों साल तक आम इंसान के साथ रहेगा।ज़ाहिर है अधिकांश खेलों के नियमों में बदलाव हो सकता है।

लेकिन इतना तय है कि देश विदेश में खिलाड़ियों की आवा जाही सामान्य होने में वक्त लग सकता है।यदि टोक्यो ओलंपिक 2021 में संभव हो पाया तो यह मान लिया जाएगा कि खेलों के लिए पहले जैसा वातावरण बन सकता है और यूरोप एवम् अन्य देशों के खिलाड़ी एवम् कोच भारत में पहले की तरह आ जा सकते हैं|

ख़ासकर, भारत में विदेशी कोचों की ज़रूरत महसूस की जाएगी।ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले तीस सालों से भी अधिक समय से भारतीय खेलों में जर्मनी, अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, फ्रांस, कोरिया, जापान आदि देशों के कोच नियुक्त किए जाते रहे हैं।सरकारों और खेल मंत्रालय को लगता है कि भारतीय खेलों को अपने कोच बेहतर परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन स्वदेशी को बढावा देने की नीति खेलों पर लागू क्यों ना हो?

बेशक,  देश के खेल संघों की पहली पसंद भी विदेशी कोच रहे हैं।यह जानते हुए भी कि उनकी नियुक्ति के बाद भी परिणाम जस के तस रहे या और गिरावट आई है।सभी जानते हैं कि कोविड19 ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ कर रख दी है।भारतीय बाज़ार तो पूरी तरह तहस नहस हो गया है और संभलने में काफ़ी वक्त लग सकता है।ज़ाहिर है खेल बज़ट पर सीधा सीधा असर पड़ेगा और महँगे विदेशी कोचों की नियुक्ति भी मुश्किल हो सकती है।ओलंपिक और विश्व स्तरीय मुकाबलों पर नज़ाए डालें तो विदेशी कोचों के शिक्षण प्रशिक्षण के बाद भी भारतीय खेलों की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा है।ज़्यादातर पदक विजेता खिलाड़ियों को उनके अपने गुरुओं द्वारा तैयार किया जाता रहा है।

यदि विदेशी कोच कारगर होते तो हॉकी, फुटबाल एथलेटिक  आदि खेलों में विदेशी क्यों बार बार बदले गए? नतीजे भी सुधार नहीं पाए।

रियो ओलंपिक तक भारतीय हॉकी जहाँ की तहाँ खड़ी नज़र आई।  यही हाल फुटबाल का भी है और एथलेटिक में तो और भी बदतर स्थिति में पहुँच गये हैं।यह हाल विदेशी कोचों के रहते हुए। लेकिन सुशील, योगेश्वर, साक्षी, विजेंद्र, मैरिकाम, सिंधु, सायना आदि के ओलंपिक पदक अपनों की मेहनत का फल रहे हैं।जानकारों और एक्सपर्ट्स का मानना है कि विदेशी की चाह में हमने अपने गुरु ख़लीफाओं के साथ बहुत अन्याय किया है।लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि ना चाहते हुए भी अपने कोचों को गले लगाना पड़ेगा।हो सकता है कोरोना के चलते आया बदलाव स्वदेशी के चलन को पुख़्ता कर दे और बेहतर परिणाम सामने आएँ।यही तो देश की सरकार भी चाहती है। स्वदेशी कोच सस्ते तो पड़ेंगे ही अपने होने का फायदा भी मिलेगा।

(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार और विश्लेषक हैं। ये उनका निजी विचार हैचिरौरी न्यूज का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।आप राजेंद्र सजवान जी के लेखों को  www.sajwansports.com पर  पढ़ सकते हैं।)

 

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