पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी रहे मनोज अग्रवाल को मुख्य सचिव बनाए जाने पर TMC और बीजेपी में तीखी नोकझोंक

TMC and BJP clash over West Bengal Chief Electoral Officer Manoj Agarwal's appointment as Chief Secretaryचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी रहे मनोज अग्रवाल हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य की सबसे चर्चित और विवादों में घिरी प्रशासनिक हस्तियों में से एक बनकर उभरे। कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस में तीखे सवालों का सामना करते हुए, तो कभी मतगणना से पहले कोलकाता के विभिन्न स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर मची अफरा-तफरी को संभालने के लिए आधी रात को मीडिया के सामने आते हुए, अग्रवाल पूरे चुनाव के दौरान चुनाव आयोग के प्रमुख संकटमोचक के रूप में दिखाई दिए।

चुनाव प्रक्रिया के दौरान एसआईआर को लेकर उठे सवाल हों या विपक्ष द्वारा निष्पक्षता पर लगाए गए आरोप मनोज अग्रवाल लगातार सुर्खियों में रहे। उन्होंने कई मौकों पर पत्रकारों के कठिन सवालों का आक्रामक अंदाज़ में जवाब दिया और चुनाव आयोग का खुलकर बचाव किया।

इसी बीच, 7 मई को ममता बनर्जी और उनकी मंत्रिपरिषद का कार्यकाल समाप्त हो गया। इससे ठीक एक दिन पहले मनोज अग्रवाल ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर. एन. रवि से मुलाकात कर नव-निर्वाचित विधायकों की सूची सौंपी थी। चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब वही मनोज अग्रवाल एक नए राजनीतिक विवाद के केंद्र में आ गए हैं।

ममता बनर्जी की हार और पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद राज्य सरकार ने मनोज अग्रवाल को नया मुख्य सचिव नियुक्त करने का फैसला लिया। यह नियुक्ति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उनकी सेवानिवृत्ति में मुश्किल से दो महीने का समय बचा है।

विपक्षी दल अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ने इस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ” और “बेशर्मी की पराकाष्ठा” करार दिया। पार्टी का कहना है कि जिस अधिकारी ने चुनाव करवाए, उसी को नई सरकार द्वारा राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर बैठाना चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मनोज अग्रवाल की नियुक्ति ऐसे समय हुई जब उससे महज़ 48 घंटे पहले विशेष चुनाव पर्यवेक्षक सुब्रत गुप्ता को मुख्यमंत्री का सलाहकार बनाया गया था। इससे विपक्ष के आरोपों को और बल मिला।

तृणमूल कांग्रेस ने यह भी याद दिलाया कि मनोज अग्रवाल को मूल रूप से चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा भेजे गए अधिकारियों के पैनल में से ही मुख्य चुनाव अधिकारी चुना था। सोमवार को राजनीतिक हलकों में उस समय अटकलें और तेज़ हो गईं, जब नबन्ना में आयोजित भाजपा सरकार की पहली कैबिनेट बैठक के दौरान मनोज अग्रवाल को मुख्यमंत्री कार्यालय के ठीक बगल में बैठे देखा गया। उनके समीप तत्कालीन मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला भी मौजूद थे।

अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता साकेत गोखले ने इस नियुक्ति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा:

“मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल, जिन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनाव करवाए, उन्हें अब भाजपा सरकार ने राज्य का मुख्य सचिव बना दिया है। भाजपा और चुनाव आयोग अब खुलकर यह संदेश दे रहे हैं कि चुनावी प्रक्रिया किस तरह प्रभावित की गई। क्या अदालतें यह सब नहीं देख रहीं, या फिर वे भी चुप्पी साधे हुए हैं? यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।”

विधानसभा चुनावों के दौरान भी तृणमूल कांग्रेस और मनोज अग्रवाल के बीच कई बार सार्वजनिक टकराव देखने को मिला था। पूर्व वित्त मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य के साथ सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर उनकी तीखी बहस भी काफी चर्चा में रही थी।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष ने भी सवाल उठाते हुए कहा, “जिस व्यक्ति को चुनाव के दौरान ‘निष्पक्ष अंपायर’ बताया गया, उसे अब भाजपा सरकार ने राज्य का शीर्ष नौकरशाह बना दिया है। क्या अब भी कोई यह मान सकता है कि 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष थे? यह बेहद शर्मनाक है।”

हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मनोज अग्रवाल राज्य के सबसे वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों में से एक हैं और उनकी नियुक्ति पूरी तरह सेवा नियमों के अनुरूप की गई है। भाजपा नेताओं का कहना है कि उनकी सरकार ने प्रशासनिक परंपराओं का पालन किया है, जबकि विपक्ष केवल राजनीतिक आरोप लगा रहा है।

पश्चिम बंगाल कैडर के 1990 बैच के आईएएस अधिकारी मनोज अग्रवाल 31 जुलाई को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। हालांकि प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि उन्हें छह महीने का सेवा विस्तार भी दिया जा सकता है।

वैसे बंगाल प्रशासन में सेवा विस्तार कोई नई बात नहीं है। इससे पहले पूर्व मुख्य सचिव समर घोष, हरि कृष्ण द्विवेदी, बी. पी. गोपालिका और मनोज पंत भी 60 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद अपने पदों पर बने रहे थे।

 

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