कॉमनवेल्थ गेम्स: सब्जी बेचने वाले के बेटे और पूर्व ई-रिक्शा चालक झंडू कुमार ने रचा इतिहास, भारत को दिलाया पदक

Commonwealth Games: Vegetable seller's son and former e-rickshaw driver Jhandu Kumar makes history, wins a medal for Indiaचिरौरी न्यूज

नई दिल्ली: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पदक खाता जिस खिलाड़ी ने खोला, उसकी कहानी सिर्फ एक मेडल की नहीं, बल्कि संघर्ष, हिम्मत और सपनों की जीत की कहानी है। बिहार के नालंदा जिले के हरनौत के रहने वाले 29 वर्षीय झंडू कुमार ने पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में कांस्य पदक जीतकर पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।

झंडू की इस उपलब्धि की सबसे खास बात यह है कि वह कभी परिवार का पेट पालने के लिए सड़क किनारे सब्जी बेचने में अपने पिता का हाथ बंटाते थे। कोरोना महामारी के दौरान उन्होंने ई-रिक्शा चलाकर रोजी-रोटी कमाई। लेकिन आज वही युवक कॉमनवेल्थ गेम्स के मंच पर तिरंगा लहराने का कारण बना।

190 किलो की ताकत ने दिलाया ऐतिहासिक पदक

झंडू कुमार ने प्रतियोगिता की शुरुआत शानदार अंदाज में की। अपने दूसरे प्रयास में उन्होंने 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया और 130.9 अंक हासिल कर आधे मुकाबले तक शीर्ष स्थान पर पहुंच गए। अंतिम प्रयास में उन्होंने 196 किलोग्राम उठाने की कोशिश की, लेकिन बारबेल रैक से टकराने के कारण लिफ्ट पूरी नहीं हो सकी।

इसके बावजूद उनका 190 किलो का प्रयास इतना दमदार था कि बाद में उतरे कई दिग्गज खिलाड़ी भी उसे पीछे नहीं छोड़ सके। आखिरकार नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने स्वर्ण और इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग ने रजत पदक जीता, जबकि झंडू कुमार ने कांस्य पदक अपने नाम कर भारत का खाता खोला।

“तिरंगा देखकर दिल भर आया”

पदक जीतने के बाद झंडू कुमार की आंखों में खुशी साफ झलक रही थी। उन्होंने कहा, “भारत के लिए पहला पदक जीतना मेरे लिए बहुत मायने रखता है। जब मैं अपना तिरंगा देखता हूं तो दिल खुशी से भर जाता है।”

उन्होंने बताया कि सबसे पहले वह अपने माता-पिता को फोन करेंगे और अपने पहले साथी गौतम भैया को यह खुशखबरी देंगे, जिनके साथ उन्होंने बचपन से अभ्यास किया।

झंडू कुमार बचपन से ही पोलियो से प्रभावित रहे। आर्थिक तंगी ऐसी थी कि परिवार चलाने के लिए कभी पिता के साथ आलू-प्याज बेचना पड़ा तो कभी ई-रिक्शा चलाना पड़ा। खेलों में उनका सफर पैरा एथलेटिक्स से शुरू हुआ, लेकिन जिम में ताकत आजमाते-आजमाते उनका मन पावरलिफ्टिंग में रम गया।

साल 2023 में राष्ट्रीय चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए उन्हें अपना ई-रिक्शा तक बेचना पड़ा। उस प्रतियोगिता में वह कोई सफल लिफ्ट नहीं लगा सके, लेकिन उनकी प्रतिभा पर पैरालंपिक पदक विजेता राजिंदर सिंह राहेलू की नजर पड़ी। इसके बाद गांधीनगर स्थित SAI सेंटर में प्रशिक्षण मिला और उनकी जिंदगी ने नई उड़ान भर ली।

झंडू ने राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाए, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार पदक जीते और अब कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को पहला पदक दिलाकर इतिहास रच दिया।

अब नजर लॉस एंजेलिस पैरालंपिक पर

कॉमनवेल्थ गेम्स का कांस्य पदक जीतने के बाद झंडू कुमार का अगला लक्ष्य लॉस एंजेलिस 2028 पैरालंपिक में देश के लिए पदक जीतना है।

झंडू कुमार की कहानी यह साबित करती है कि हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिल खुद रास्ता बना लेती है। सड़क किनारे सब्जी बेचने वाले परिवार का बेटा आज दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों में से एक पर भारत का तिरंगा लहरा रहा है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की जीत नहीं, बल्कि करोड़ों संघर्षरत भारतीयों के सपनों की जीत है।

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