धरती का अनूपम सौंदर्य है लद्दाख में

सोमा राजहंस

नई दिल्ली: क्या आप कभी ऐसी जमीं से रुबरु हुए हैं जहां एक ओर बर्फ से ढकी उंची उंची एवं विशाल पर्वत मालाएं हों तो दूसरी ओर खुले मगर पथरीले मैदान में कलकल बहती सिधंू नदी का अद्भुत नाद हो, जहां दूर दूर तक चट्टानों से घिरी, रहस्यमयी आवरण में लिपटी धरती पर रुई से कोमल बादलों का सहज ही स्पर्श हो जाता हो,जहां संकरंेदर्रो से गुजरकर एक ऐसे भू भाग को देखने का अवसर हो जो तमाम कठिनाइयों से गुजरने के बाद आपको कभी ना भूलने वाले परी लोक में आने का अहसास हो, जहां पर बौð धर्म की छत्रछाया में शातं लेकिन रंगीन सभ्यता जो चट्टानों में भी रंगीन संस्कृति के फूल खिला रही है जहां आकर आपको लगे कि जैसे आप हिमालय की गोद में बैठे हों. जो अपनी प्राकृतिक सुदंरता के वजह से पर्यटकांे को अपनी ओर खिचंता हो, जिसक एक तरफ चीन है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान.

यहां ठंड काफी पड़ती है लेकिन अगर एक बार आप यहां के माहौल में एडजस्ट हो जाएं तो हसीन नजारों का लुफ्त उठाने से कोई आपको रोक नहीं सकता. लद्याख जाकर आपको प्रकृति की खूबसूरती का अनोखा एहसास होगा. दूर दूर तक फैली दिलकश वादियों को देखकर आपकी आंखों को पलक झपकाने की फुर्सत नहीं मिलेगी. लेकिन अगर आप इनसे पल भर के लिए भी अपनी आंखें हटाने में कामयाब हो गए तो हो सकता है कि इस प्राचिन प्रदेश की हिफाजत करने वाले ऊंचे ऊंचे पहाड़ों में छिपे अजीबोगरीब रहस्यों को जानने में सफल हो जाएं.
लद्याख में आप एक्यूट माउंटेन की छोटी सी समस्या से रुबरु हो सकते हैं. इसके लक्षण हर व्यक्ति में अलग अलग हो सकते हैं. लद्याख में आॅक्सिजन लेवल काफी कम है जिसकी वजह से कई पर्यटकों को भूख न लगने, सर्दी जुकाम और उल्टी जैसी समस्या हो सकती है. कई बार आपको कंपकंपाती ठंड और धूप की तपिश का एक साथ अनुभव होगा. सीढ़ियां चढ़ते समय या जूते के फीते बांधते समय भी आपको सांस लेने में तकलीफ हो सकती है, लेकिन इससे डरने के बजाय आप अगर इसका सामना कर लेंगे तो यकीन मानिए आप एक शानदार प्राकृतिक सुंदरता का आनंद ले पाएंगे.
नंगे पहाड़ों से घिरी लद्दाख की धरती, जहां पर पेड़ नाममात्र के हैं तथा बारिश अक्सर चिढ़ाकर भाग जाती है, लामाओं की धरती के नाम से भी जानी जाती है। यहां पर धर्म को बहुत ही महत्व दिया जाता है। प्रत्येक गली-मोहल्ले में आपको स्तूप (छोटे मंदिर) तथा ‘प्रेयर व्हील’ (प्रार्थना चक्र) भी नजर आएंगे जिन्हें घूमाने से सभी पाप धुल जाते हैं तथा भगवान का नाम कई बार जपा जाता है, ऐसा लेहवासियों का दावा है।

लेह में कितने स्तूपा हैं, इसकी कोई गिनती नहीं है। कहीं-कहीं पर इनकी कतारें नजर आती हैं। सिर्फ शहर के भीतर ही नहीं, बल्कि सभी सीमांत गांवों, पहाड़ों अर्थात जहां भी आबादी का थोड़ा-सा भाग रहता है, वहां इन्हें देखा जा सकता है। इन स्तूपों में कोई मूर्ति नहीं होती बल्कि मंदिर के आकार के मिट्टी-पत्थरों से भरा एक ढांचा खड़ा किया गया होता है जिसे स्तूपा कहा जाता है। वैसे प्रत्येक परिवार की ओर से एक स्तूपा का निर्माण अवश्य किया जाता है।

स्तूपा के साथ-साथ प्रार्थना चक्र, जिसे लद्दाखी भाषा में ‘माने तंजर’ कहा जाता है, लद्दाख में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। 5 से 6 फुट ऊंचे इन तांबे से बने चक्रों पर ‘ॐ मने पदमने हों’ के मंत्र खुदे होते हैं सैकड़ों की संख्या में। ये चक्र धुरियों पर घूमते हैं और एक बार घुमाने से वह कई चक्कर खाता है तो कई बार ही नहीं, बल्कि सैकड़ों बार उपरोक्त मंत्र ऊपर लगी घंटी से टकराते हैं जिनके बारे में बौद्धों का कहना है कि इतनी बार वे भगवान का नाम जपते हैं अपने आप।

वैसे भी ‘माने तंजर’ बौद्धों की जिंदगी में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसको घुमाने के लिए कोई समय निर्धारित नहीं होता है। जब भी इच्छा हो या फिर समय मिलने पर आदमी इसे घुमा सकता है। अक्सर देखा गया है कि हर आने वाला व्यक्ति इसे घुमाता है और दिन में कई बार इसे घुमाया जाता है, क्योंकि हर गली-मोहल्ले, चौक-बाजार आदि में ये मिल जाते हैं। इनके बारे में प्रचलित है कि उन्हें घुमाने से आदमी के सारे पाप धुल जाते हैं।

सीधी-सादी जिंदगी व्यतीत करने वाले लद्दाखी कितनी धार्मिक भावना अपने भीतर समेटे होते हैं, यह इस बात से भी जाहिर होता है कि एक बड़े परिवार का सबसे बड़ा बेटा लामा बनने के लिए दे दिया जाता है, जो बाद में ल्हासा में जाकर शिक्षा प्राप्त करता है और ब्रह्मचर्य का पालन करता है।

कभी भी लद्दाखियों के बीच झगड़ों की बात सुनने में नहीं आती है जबकि जब उन्होंने ‘फ्री लद्दाख फ्रॉम कश्मीर’ तथा लेह को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ा था तो सरकार ही नहीं, बल्कि सारा देश हैरान था कि हमेशा शांतिप्रिय रहने वाली कौम ने ये कौन सा रास्ता अख्तियार किया है? लद्दाखियों का यह प्रथम आंदोलन था जिसमें हिंसा का प्रयोग किया गया था जबकि अक्सर लड़ाई-झगड़ों में वे पत्थर से अधिक का हथियार प्रयोग में नहीं लाते थे। इसके मायने यह नहीं है कि लद्दाखी कमजोर दिल के होते हैं बल्कि देश की सीमाओं पर जौहर दिखलाने वालों में लद्दाखी सबसे आगे होते हैं।

कब जाएं
लद्याख जाने का सबसे अच्छा समय अप्रैल से अगस्त तक है, कुदरती खूबसूरती से मालामाल इस प्रदेश की यात्रा पर गए पर्यटकों को अपना टूर सितंबर की शुरुआत में समाप्त कर देना चाहिए.

क्या देखें
यहां घूमने लायक काफी जगह है, जहां के खूबसूरत नजारे आपका मन मोह लेगें. खरदूंगला चांग ला, बारालाचा ला, तांग ला और कुछ ऐसे ही दर्रे देख कर आप आश्चर्य चकित हो जाएंगे. यहां आपको बौद्ध मठों में सुकून का एहसास होगा. अलची, लिकिर और लामयुरु मठ यहां पर खासतौर से देखने लायक हैं.
लद्दाख उत्सवों का दुसरा नाम है. कड़कड़ाती ठडं में भी यहां के लोग गीत संगीत नृत्य समारोह का आनदं उठाते हैं. मई जून के महिने में मनाया जाना वाला विश्व स्तरीय सिधुं महोत्सव में भाग लेने और लद्दाख अनुठी दुनिया को करीब से जानने के लिए देश विदेश से लाखों पर्यटक यहां आते हैं.
झील यहां की प्राकृतिक खूबसूरती में चार चांद लगाती है. पामोंग सो यहां की खूबसूरत झीलों में से एक है. करजोक में सीमोरीरी और सोकर सो झील की खूबसूरती देखने लायक है.

क्या खाएं

खाने में ज्यादातर मैगी और मोमो ही मिलेगी, लेह का मटन मोमोज यहां की खासियत है. लद्याखी स्पेशल चाय का रंग गुलाबी होता है और इसका टेस्ट गजब का होता है. यहां के स्थानीय व्यंजनों जैसे थेनथुक , थुपका और चुटागी का भी स्वाद लिया जा सकता है.

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