कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे का चैप्टर क्लोज्ड

शिवानी रज़वारिया

विकास दुबे एक हिस्ट्रीशीटर, गैंगस्टर से राजनेता का सफ़र तय कर आख़िर अपनी बनाई ज़ुर्म की दुनिया में ही ढेर  हो गया। 10 जुलाई की सुबह उसकी जिंदगी की आख़िरी सुबह बन गई। उत्तर प्रदेश में कानपुर देहात जिले में रहकर उसने अपनी गुंडागर्दी के झंडे दूर दूर तक गाड़ रखे थे।

कानपुर में विकास दुबे के नाम का बड़ा दबदबा था यहां तक की पुलिस भी उससे खोफ़ खाती थी। दुबे के ख़िलाफ़  पहला आपराधिक मामला 1990 के दशक की शुरुआत में दर्ज किया गया था,और 2020 तक उसके नाम पर 60 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे। कानपुर का कुख्यात बदमाश विकाश दुबे का नाम अपराध की दुनिया से कई दशक से जुड़ा है कई बार उसे पुलिस ने कई मामलों में गिरफ्तार भी किया है, लेकिन आज तक उसे सजा नहीं हो पाई।  हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे साल 2001 में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला हत्याकांड का मुख्य आरोपी था। साल 2000 में कानपुर के शिवली थानाक्षेत्र स्थित ताराचंद इंटर कलेज के सहायक प्रबंधक सिद्घेश्वर पांडेय की हत्या में भी विकास दुबे का नाम शामिल था। कानपुर के शिवली थानाक्षेत्र में ही साल 2000 में रामबाबू यादव की हत्या के मामले में विकास दुबे पर जेल के भीतर रहकर साजिश रचने का आरोप था।

साल 2004 में केबल व्यवसायी दिनेश दुबे की हत्या के मामले में भी विकास आरोपी था। 2001 में कानपुर देहात के शिवली थाने के अंदर घुस कर इंस्पेक्टर रूम में बैठे तत्कालीन श्रम संविदा बोर्ड के चौयरमेन, राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त बीजेपी नेता संतोष शुक्ल को गोलियों से भून दिया था। कोई गवाह न मिलने के कारण केस से बरी हो गया था।

पुलिस प्रशासन और ज़ुर्म की दुनिया की तह की शिनाख्त करने वाले विशेषज्ञ भले ही विकास दुबे के नाम से वाक़िफ हो पर आम जनता के लिए विकास दुबे का नाम तब सामने आया जब 2 जुलाई की रात कानपुर के बिकरू गांव पुलिस की टीम विकास दुबे को पकड़ने के लिए पहुंची और विकास दुबे ने पुलिस का जेसीबी से रास्ता घेर दिया और गोलियों से आठ पुलिस वालों की हत्या कर दी। जैसे ही ये ख़बर मीडिया तक पहुंची आग की तरह फ़ैल गई और जब इस वक़्त देश कोरोना से लड़ रहा है अचानक विकास दुबे का नाम चैनलों, अखबारों की हेडलाइनस में छा गया। आम जनता की ज़ुबान पर भी ये मुद्दा बन गया।

विकास दुबे 8 शहीद पुलिसकर्मियों की हत्या के बाद कई दिन तक फ़रार रहा। उसे पकड़ने के लिए गली गली उसके नाम के पोस्टर लगाए गए। 50,000 का इनाम भी रखा गया जिसे बढ़ाकर 5 लाख़ कर दिया गया। 75 जिलों की पुलिस टीम अलर्ट पर थी, वहीं यूपी की सीमा से लगे प्रदेशों पर भी विशेष नज़र रखी जा रही थी।कई बार चकमा देकर अपने नेटवर्क्स की मदद से वह बच निकल रहा था पर जब वह भागते भागते मध्य प्रदेश के उज्जैन के महाकाल मंदिर में उसे पुलिस ने दबोच लिया। कहानी अभी यहीं खत्म नहीं होती अभी तो क्लाइमैक्स बाकी है।

एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उज्जैन पुलिस ने विकास दुबे से पूछताछ की जिसमे उसने जो बताया उसे सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे। पूछताछ में विकास दुबे ने कहा कि उसके मुखबिर सिर्फ चौबेपुर थाने में ही नहीं बल्कि आसपास के तमाम थानों में थे। मैंने लॉकडाउन के दौरान सभी पुलिसवालों की काफी मदद की थी। काफ़ी लोगों का कहना था कि विकास को पकड़ने पुलिस आने वाली है इसका उसे पहले से पता था। विकास के इस बयान से यह बात मानी जा सकती है। आगे उसने जो बाते बताई वो उसकी हैवानियत की ओर इशारा करती हैं। उसने बताया कि वह आठों पुलिसकर्मियों के शवों को एक साथ जलाना चाहता था ताकि सबूत मिट जाएं इसके लिए उसने अपने घर में तेल का टैंक भी रखा था और सभी शवों को एक के ऊपर एक रख के जलाने वाला था। पुलिस वालों के शवों को पास के कुएं में रख दिया गया था। हालांकि मौका नहीं मिल पाया और वह फरार हो गया।

बिकरू कांड में डीएसपी देवेंद्र मिश्रा सहित आठ पुलिस वालों की जान गई थी। विकास दुबे ने बताया कि देवेंद्र मिश्रा को मैंने इसलिए मारा क्योंकि उससे मेरी बनती नहीं थी और वे कई बार मुझे धमकी भी दे चुके थे। विकास ने पूछताछ में यह भी बताया कि शहीद देवेंद्र मिश्रा का पैर काटा गया था क्योंकि वह मेरे एक पैर में गड़बड़ी को लेकर टिप्पणी कर चुके थे।

अब आते है अंतिम पड़ाव पर आख़िर कैसे विकास दुबे पुलिस की गोलियों से भूना गया।

छह दिन की तलाश के बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, जिस कुख्यात अपराधी को लेकर कई राज्यों की पुलिस अलर्ट थी, उसकी गिरफ्तारी उतनी ही नाटकीय ढंग से हुई और उसका अंत भी किसी फिल्म के अंत से कम नहीं लगा।

जिस तरह फिल्मों में कुख्यात अपराधी को पुलिस लेकर जा रही होती है कुछ इसी तरह हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को भी एमपी की स्पेशल टास्क फ़ोर्स उज्जैन से कानपुर ले जा रही थीं, तभी रास्ते में उनकी गाड़ी पलट गई। बिल्कुल वैसे ही जैसे होता है अपराधी विकास दुबे ने भागने की कोशिश की जिसके बाद पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें अभियुक्त की मौत हो गई।

कानपुर रेंज के आईजी मोहित अग्रवाल ने विकास दुबे के मारे जाने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि चार पुलिस कर्मी भी घायल हुए हैं जिनका कानपुर के सीएचसी अस्पताल (कम्युनिटी हेल्थ सेन्टर या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र) में उनका इलाज चल रहा है। कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर आरबी कमल ने पत्रकारों से कहा,”विकास दुबे को चार गोलियाँ लगी थीं। तीन गोली सीने में और एक हाथ में। विकास दुबे को मरी हुई हालत में लाया गया था।”उन्होंने बताया कि मुठभेड़ में तीन सिपाही घायल हुए हैं जिन्हें मल्टीपल इंजरी हुई है। दो पुलिसकर्मियों को गोली छूकर निकल गई है और उनकी स्थिति स्थिर है।

इस तरह हैवानियत का प्रदेश की ज़मीन से अंत हुआ। अब देखना ये होगा कि जनता और स्पेशली विपक्ष को क्लाइमैक्स कैसा लगा। क्योंकि जब 8 पुलिसकर्मी शहीद हुए तब विकास दुबे को पकड़ने की मांग उठी जब वो पुलिस की पकड़ में नहीं आ रहा था तब विपक्ष सबसे जादा परेशान था। फिर वो पकड़ा गया पकड़े जाने के बाद के पार्ट को विपक्ष ने अलग आईना दिखाया अब उसके एनकाउंटर को विपक्ष कितना पसंद और नापसंद करेगा?

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