शेखर सुमन और कॉमेडियन भारती सिंह को 2010 के हेट स्पीच मामले में राहत
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक्टर और टीवी होस्ट शेखर सुमन और कॉमेडियन भारती सिंह के खिलाफ 2010 के एक हेट स्पीच मामले को रद्द कर दिया है। यह मामला ‘कॉमेडी सर्कस का जादू’ शो में किए गए एक जोक से जुड़ा था। कोर्ट ने माना कि यह कॉमिक एक्ट भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A के तहत कोई अपराध नहीं था। यह धारा धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से संबंधित है। कोर्ट ने कहा कि इस परफॉर्मेंस के पीछे कोई गलत इरादा नहीं था।
जस्टिस अमित बोरकर ने कहा कि कलाकारों या शो के जजों के खिलाफ आपराधिक कानून का इस्तेमाल इतनी आसानी से नहीं किया जाना चाहिए, सिर्फ इसलिए कि किसी को संदर्भ से हटकर देखे गए कंटेंट से ठेस पहुंची हो। कोर्ट ने कहा कि धारा 295A के तहत अपराध साबित करने के लिए धार्मिक मान्यताओं को जानबूझकर निशाना बनाने और गलत इरादे का स्पष्ट सबूत होना ज़रूरी है। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ये दोनों ही चीज़ें मौजूद नहीं थीं।
कथित तौर पर आपत्तिजनक शब्दों, “या अल्लाह! रसगुल्ला! दही भल्ला!”, का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि इन शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ तुकबंदी और हास्य प्रभाव पैदा करने के लिए किया गया था। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार किया कि रसगुल्ला और दही भल्ला आम खाने की चीज़ें हैं और इनका कोई अंतर्निहित धार्मिक अर्थ नहीं होता।
कोर्ट ने कहा, “किसी कॉमिक एक्ट में खाने की चीज़ों का ज़िक्र कर देने भर से धर्म का अपमान नहीं हो जाता। इसके लिए कुछ और भी ज़रूरी है। ऐसा कोई सबूत होना चाहिए जिससे यह साबित हो सके कि इन शब्दों को जानबूझकर किसी पर हमला करने के हथियार के तौर पर चुना गया था।”
यह आदेश सुमन और सिंह द्वारा 2012 में दायर उन याचिकाओं पर आया, जिनमें उन्होंने रज़ा अकादमी के मोहम्मद इमरान दादानी रसाबी की शिकायत पर 2010 में दर्ज FIR को चुनौती दी थी। यह शिकायत ‘कॉमेडी सर्कस का जादू’ के उस एपिसोड से जुड़ी थी जो 20 नवंबर 2010 को प्रसारित हुआ था।
उस समय, सुमन इस शो में जज थे, जबकि सिंह एक कलाकार के तौर पर उस एपिसोड में नज़र आई थीं, जो अलग-अलग पेशों के हास्यपूर्ण चित्रण पर आधारित था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इस एपिसोड में इस्तेमाल किए गए कुछ शब्दों से मुसलमानों की भावनाएं आहत हुई थीं।
हालांकि, कोर्ट ने सुमन और सिंह के बचाव पक्ष की दलीलों को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने कहा कि इस शो का मकसद हल्का-फुल्का पारिवारिक मनोरंजन करना था और इन शब्दों का इस्तेमाल सिर्फ तुकबंदी और हास्य प्रभाव के लिए किया गया था, न कि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से। इसी आधार पर कोर्ट ने इस मामले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से ऐसा कोई जानबूझकर किया गया या गलत इरादे से किया गया प्रयास साबित नहीं होता, जिसका मकसद धार्मिक मान्यताओं को निशाना बनाना हो।
