… तो फिर शारीरिक शिक्षक दर बदर क्यों हैं!

राजेंद्र सजवान

कोविड 19 ने भले ही खेल गतिविधियों को बुरी तरह प्रभावित किया है लेकिन कुछ संस्थाएँ हैं, जो की देश में खेलों और शारीरिक शिक्षा के विकास के लिए लगातार प्रयासरत हैं। ऐसी ही एक संस्था हैं फ़िजिकल एजुकेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पेफ़ी), जिसने लॉक डाउन के चलते लगभग सात सप्ताह तक बिना रुके फेसबुक लाइव के 57 सेशन आयोजित किए। पेफ़ी के अनुसार देश में लाखों लोगों ने शारीरिक शिक्षा से जुड़े अनेक दिग्गजों और एक्सपर्ट्स को देखा और सुना। एक और  मज़बूत कदम बढाते हुए पेफ़ी ने 13 जून को अपने वेबिनार सीरीज़ के दूसरे संस्करण में भारत सरकार के खेल मंत्री किरण रिजिजू को आमंत्रित किया और यह संदेश देने  का प्रयास किया गया कि देश के नागरिकों और खिलाड़ियों को यदि स्वस्थ रहना है और अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में पदक जीतने हैं तो स्कूल स्तर से शारीरिक शिक्षा के महत्व को समझना होगा।

खेल मंत्री ने हमेशा की तरह देश के छात्रों और युवाओं को फिट और हिट भारत बनाने पर ज़ोर दिया और कहा कि ऐसा तब ही संभव होगा जब स्कूलों में शुरुआत से ही शारीरिक शिक्षा को महत्व दिया जाएगा। उन्होने स्कूली पाठ्यकर्म में खेल गतिविधियों को बढ़ाने और तमाम स्कूल- कालेजों को गंभीरता दिखाने का आह्वान किया और कहा कि हर बच्चा कोई ना कोई खेल ज़रूर खेले। उनके अनुसार खेल गतिविधियाँ शारीरिक और मानसिक विकास के लिए ज़रूरी हैं और यही कारण है कि सरकार ने खेल को पाठ्यक्रम का अभिन्न विषय बनाने का फ़ैसला किया है। खेलो इंडिया को उन्होने सरकार की खेल विकास और चरित्र निर्माण योजना बताया और कहा कि उनकी सरकार खेलों और खिलाड़ियों के चहुमुखी विकास के लिए दृढ़ संकल्प हैं, और इस अभियान में पेफ़ी की भूमिका शानदार रही है।

इसमें दो राय नहीं कि पेफ़ी पिछले कुछ सालों से शारीरिक शिक्षा के महत्व और शारीरिक शिक्षकों को संरक्षण देने की दिशा में प्रयास रत है और यही कारण है कि भारत सरकार के खेल मंत्रालय ने उसे मान्यता प्रदान की है। संभवतया, खेल मंत्री मानते हैं कि देश में खेलों के लिए माहौल बनाने और स्पोर्ट्स कल्चर डेवलप करने की दिशा में पेफ़ी जैसे संगठन बड़ी भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं।

बेशक, पेफ़ी का आन लाइन कार्यक्र्म शानदार रहा। खेल मंत्री के साथ बतियाने वाले शारीरिक शिक्षा विद, खेल जानकारों और अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों ने भी खूब वाह वाह लूटी लेकिन शायद ही किसी ने यह पूछने का साहस दिखाया हो कि देश में शारीरिक शिक्षा की  हालत खराब क्यों है? क्यों साल दर साल शारीरिक शिक्षक घट रहे हैं, नौकरियों से निकाले जा रहे हैं और क्यों उनके साथ अछूतों सा व्यवहार किया जाता है। पेफ़ी का दावा है कि उसका संगठन देश भर में पहचान बना चुका है और हर राज्य में उसके सदस्य शारीरिक शिक्षकों के हितों के लिए अपने स्तर पर लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन क्या ऐसा है? यदि ऐसी स्थिति है तो क्यों यूपी, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और तमाम राज्यों से हज़ारों की छंटनी हो रही है और  क्यों कई लाख बेरोज़गार हैं? क्यों शारीरिक शिक्षकों को सामान्य शिक्षकों की तुलना में हेय माना जाता है? इस बारे में पेफ़ी या किसी अन्य संगठन ने कितनी बार आवाज़ उठाई?

अफ़सोस इस बात का है कि एक तरफ तो सरकारें हिट और फिट भारत की कल्पना कर रही हैं और झूठे नारे     उछाल रही हैं तो दूसरी तरफ देश की भावी पीढ़ी को सिखाने पढ़ाने और शारीरिक एवम् चारीत्रिक ज्ञान देने वाले बीपीएड, एमपीएड और पीएचडी लाखों की तादात में बेरोज़गार घूम रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार लगभग पचास लाख क्वालीफाइड दर दर की ठोकर खाने के लिए विवश हैं, जिनमें से नब्बे फीसदी ओवर एज हो चुके हैं।

समस्या का दूसरा पहलू और भी शर्मनाक बताया जाता है। पेफ़ी के कुछ सदस्य और सदस्य इकाइयों ने अपना नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि शारीरिक शिक्षकों के लिए भर्ती नियम अलग अलग राज्यों में अपनी सुविधा के अनुसार बनाए गये हैं। कोई 35 से 40 साल तक नौकरी दे रहा है तो ज़्यादातर ने 30 साल का नियम बना कर लाखों का भविष्य खराब कर दिया है। इस मामले पर खेल मंत्रालय, पेफ़ी और शारीरिक शिक्षा के ठेकेदार कुछ भी नहीं बोलना चाहते। उनका काम बस मंच साझा करना, वीडियो कांफ्रेंसिंग में वही घिसा पिटा राग अलापना और बेरोज़गार शारीरिक शिक्षकों के घावों पर नमक डालना है।

पेफ़ी के राष्ट्रीय सचिव पियूष जैन मानते हैं कि उन्हें बहुत से अधूरे काम पूरे करने हैं और खेल मंत्रालय से मान्यता मिलने के बाद पेफ़ी ने  बाकायदा प्रयास शुरू कर दिए हैं। बेशक, पेफ़ी  के लिए अब कड़ी परीक्षा का दौर शुरू हो गया है।

(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार और विश्लेषक हैं। ये उनका निजी विचार हैचिरौरी न्यूज का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।आप राजेंद्र सजवान जी के लेखों को  www.sajwansports.com पर  पढ़ सकते हैं।)

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