बिन विवाद, कैसा खेल रत्न!

राजेंद्र सजवान  

हर साल की तरह राष्ट्रीय खेल अवार्डों  को लेकर चर्चा ज़ोर शोर से शुरू हो गई  है और खेल संघों और खेल मंत्रालय में जोड़ तोड़ चल निकली है| इसके साथ ही एक दबी हुई बहस फिर से मुहं उठा रही है| वह यह कि1991 में जब विश्वनाथन आनंद को पहला राजीव गाँधी खेल रत्न दिया गया था तो मीडिया ने जानना चाहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के नाम पर अवॉर्ड का नामकरण कहाँ तक न्यायसंगत है? तब बात आई गई हो गई| कुछ साल बाद जब हॉकी जादूगर मेजर ध्यांचंद के नाम पर 29 अगस्त को खेल अवार्डों का दिया जाना तय हुआ तो यही सवाल एक बार फिर हवा में तैरने लगा कि खेल अवॉर्ड ध्यान चन्द के जन्मदिन पर दिए जाएँगे तो फिर उन्हीं के नाम पर खेल रत्न क्यो नहीं?

देखा जाए तो शायद ही किसी ने कभी इस मसले को गंभीरता से उठाया हो| लेकिन जैसे हालात चल रहे हैं, उसे देखते हुए खेल रत्न को लेकर बड़ा विवाद हो सकता है,क्योंकि सवाल फिर किसी ने पूछ लिया है और शायद आगे भी पूछा जाता रहेगा| कारण खेल अवार्डों को लेकर राजनीति की अपने देश में परंपरा रही है| इस बार भी कई खिलाड़ी दावेदार हैं और कम से  कम पाँच छह के बीच काँटे की टक्कर हो सकती है| जिसका नाम कटा वही आरोप लगाना शुरू कर देगा, जैसा कि पहले भी हुआ है।

देखा जाए तो खेल रत्न को लेकर शुरू से ही विवाद होते रहे हैं| पहले पहल जब 1991 में विश्वनाथन आनंद को सम्मान मिला तो कुछ लोगों ने कहा कि शतरंज ओलंपिक में शामिल नहीं है| जब सचिन तेंदुलकर को सम्मानित किया गया तो वही सवाल दोहराया गया| इसमें दो राय नहीं कि  ओलंपिक पदक के रंग के हिसाब से अभिनव बिंद्रा देश के श्रेष्ठ खिलाड़ी बनते हैं लेकिन उन्होने स्वर्ण 2008 में जीता, जबकि  खेल रत्नअवॉर्ड 2001 में हीबन गए थे| तब भी बहुत से सवाल पूछे गये थे, जोकि काफ़ी हद तक सही भी थे| इतना ही नहीं खेल रत्न पाने के बाद जब कई साल तक बिंद्रा का प्रदर्शन स्तरीय नहीं रहा तो उन पर और चयन समिति पर फब्तियाँ कसी जाती रहीं|

पिछली बार जब बजरंग पूनिया और पैरा एथलीट दीपा मलिक को एक साथ सम्मान दिया गया तो कुछ खिलाड़ियों और खेल जानकारों में यह फुसफुसाहट भी शुरू हो गई कि पैरा खिलाड़ियों के लिए अवार्ड अलग से होने चाहिए|

अब तक 38 खिलाड़ी खेल रत्न पा चुके हैं लेकिन आनंद, लीयेंडर, धनराज, बिंद्रा, धोनी, मैरीकोम, सुशील, योगेश्वर, बिजेंद्र, पीवी सिंधु, कोहली, बजरंग और कुछ अन्य चैम्पियनों जैसे कद वाले सम्मानित खिलाड़ी ज़्यादा नहीं हैं| खिलाड़ियों  और खेलसंघों के आगे सरकार और उसकी चयन समितियों को अनेक अवसरों पर झुकना भी पड़ा| नतीजन आठ ऐसे मौके आए जब दो या अधिक खिलाड़ियों को दबाव के चलते खेल रत्न बनाया गया| देखें इस बार कौन बनेगा खेल रत्न और क्या सब कुछ शांति से तय हो पाएगा?

(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार और विश्लेषक हैं। ये उनका निजी विचार हैचिरौरी न्यूज का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है।आप राजेंद्र सजवान जी के लेखों को  www.sajwansports.com पर  पढ़ सकते हैं।)

 

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