सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने की कहानी: कैसे उनके नाम पर बीजेपी और जदयू में बनी सहमति

The Story of Samrat Chaudhary Becoming Chief Minister: How Consensus Was Reached Between the BJP and JD(U) on His Nameचिरौरी न्यूज

पटना: बिहार की राजनीति में मंगलवार को बड़ा फैसला लेते हुए भाजपा ने सम्राट चौधरी को राज्य का अगला मुख्यमंत्री चुन लिया। इसके साथ ही वे राज्य में इस पद पर पहुंचने वाले पार्टी के पहले नेता बन गए हैं। यह निर्णय उस समय आया जब नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए चुने जाने और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद कई दिनों से सस्पेंस बना हुआ था।

सम्राट चौधरी का बिहार के मुख्यमंत्री पद तक पहुँचना सिर्फ एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं, बल्कि लंबी रणनीति, बदलते गठबंधन समीकरण और सामाजिक संतुलन का परिणाम है। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद जहाँ सत्ता को लेकर अटकलें तेज थीं, वहीं पर्दे के पीछे भाजपा और जदयू के बीच गहन मंथन चला। अंततः अनुभव, ओबीसी नेतृत्व और संगठनात्मक पकड़ को ध्यान में रखते हुए सम्राट चौधरी के नाम पर सहमति बनी, जिसने बिहार की राजनीति को नया मोड़ दे दिया।

57 वर्षीय सम्राट चौधरी फिलहाल उपमुख्यमंत्री और तारापुर से भाजपा विधायक हैं। नीतीश कुमार के इस्तीफे से पहले ही राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज थी कि वे मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे हैं। यह चर्चा उस समय हकीकत में बदल गई जब भाजपा विधायक दल की अहम बैठक में उनके नाम पर सहमति बन गई।

बैठक में उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा और वरिष्ठ नेताओं मंगल पांडेय, दिलीप जायसवाल और रेणु देवी ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे केंद्रीय पर्यवेक्षक और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में मंजूरी मिली। शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि सम्राट चौधरी को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया है।

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने का महत्व

सम्राट चौधरी का चयन कई मायनों में अहम माना जा रहा है। वे लंबे राजनीतिक अनुभव, सामाजिक आधार और प्रशासनिक समझ का संतुलित मिश्रण हैं। 1990 से सक्रिय राजनीति में रहने के कारण उन्होंने बिहार की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों, मंडल राजनीति से लेकर गठबंधन दौर और भाजपा के उभार तक, को करीब से देखा है।

उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका कुशवाहा (कोइरी) समाज से जुड़ाव है, जो बिहार की अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कुर्मी समुदाय और अत्यंत पिछड़ा वर्ग के साथ मिलकर यह सामाजिक समीकरण राज्य की राजनीति में निर्णायक माना जाता है।

प्रशासनिक अनुभव के लिहाज से भी वे मजबूत माने जाते हैं। 2024 से उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने वित्त, शहरी विकास और पंचायती राज जैसे अहम विभाग संभाले हैं, जिससे उन्हें शासन चलाने का व्यावहारिक अनुभव मिला है। खास बात यह भी है कि एक समय नीतीश कुमार के आलोचक रहे सम्राट चौधरी बाद में उनके साथ सरकार में काम करते नजर आए, जो बिहार की गठबंधन राजनीति की लचीली प्रकृति को दर्शाता है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि

सम्राट चौधरी का संबंध एक मजबूत राजनीतिक परिवार से है। उनके पिता शकुनी चौधरी छह बार विधायक रहे, जबकि उनकी माता पार्वती देवी भी विधायक रह चुकी हैं। इसी पृष्ठभूमि ने उनके राजनीतिक करियर की नींव रखी।

उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की और 2000 में परबत्ता से विधायक बने। बाद में वे राबड़ी देवी सरकार में मंत्री भी रहे। 2014 में उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड) का दामन थामा और जीतन राम मांझी सरकार में मंत्री बने।

2017 में भाजपा में शामिल होना उनके करियर का अहम मोड़ साबित हुआ। इसके बाद उन्होंने पार्टी में लगातार तरक्की की और 2023 में बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बने।

आज वे भाजपा के प्रमुख ओबीसी चेहरों में गिने जाते हैं और संगठन को मजबूत करने में उनकी अहम भूमिका रही है। ऐसे में उनका मुख्यमंत्री बनना न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी भाजपा के लिए एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है।

 

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