ईरान पर 3 विकल्प: ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बंद दरवाज़ों के पीछे बातचीत
चिरौरी न्यूज
नई दिल्ली: इस सप्ताह इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात कर ईरान को लेकर स्पष्ट संदेश दिया कि सभी विकल्प खुले रखे जाएं। हालांकि, इज़राइली अधिकारियों के अनुसार करीब 90 मिनट तक चली इस बैठक का उद्देश्य अमेरिका को किसी नए युद्ध की ओर धकेलना नहीं था, बल्कि कूटनीति, आर्थिक दबाव और सैन्य कार्रवाई समेत सभी संभावित विकल्पों पर गंभीरता से विचार करना था, क्योंकि ईरान के साथ तनाव अब एक नए और अधिक संवेदनशील दौर में प्रवेश कर चुका है।
मंगलवार को हुई यह उच्चस्तरीय बैठक ऐसे समय में हुई, जब पिछले सप्ताह अमेरिकी सैन्य हमलों के रुकने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप एक ओर तेहरान के साथ बातचीत जारी रखे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई की तैयारियां भी बरकरार हैं। बैठक समाप्त होने के कुछ घंटों बाद ही ईरान ने जॉर्डन स्थित एक अमेरिकी सैन्य अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया, जिसके बाद ट्रंप ने कड़ा जवाब देने का संकल्प जताया।
Axios की रिपोर्ट के अनुसार, बैठक में ईरान का मुद्दा पूरी तरह से छाया रहा। ट्रंप और नेतन्याहू ने स्थिति से निपटने के लिए तीन प्रमुख विकल्पों पर विस्तार से चर्चा की।
कूटनीतिक समाधान
पहला रास्ता बातचीत के माध्यम से समझौते का था। ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ईरानी अधिकारियों के साथ वार्ता में जुटे हुए हैं। हालांकि, इज़राइली अधिकारी ने स्वीकार किया कि दोनों पक्षों के बीच अभी भी कई महत्वपूर्ण मतभेद बने हुए हैं। नेतन्याहू ने भी संदेह जताया कि क्या ईरान ऐसा समझौता स्वीकार करेगा, जो उसके परमाणु कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से सीमित कर सके।
दूसरा विकल्प ईरान के खिलाफ मौजूदा नौसैनिक नाकाबंदी को जारी रखते हुए अतिरिक्त प्रतिबंधों और अन्य आर्थिक उपायों के जरिए उस पर दबाव और बढ़ाने का था।
तीसरे विकल्प के तहत यदि कूटनीतिक प्रयास और आर्थिक प्रतिबंध विफल रहते हैं, तो ईरान के खिलाफ सैन्य हमलों को दोबारा शुरू करने और उनका दायरा बढ़ाने पर विचार किया गया।
एक इज़राइली अधिकारी ने Axios से कहा, “हमने सभी विकल्पों पर खुलकर और विस्तार से चर्चा की। उद्देश्य किसी एक विकल्प को बेहतर बताना नहीं था, बल्कि यह समझना था कि हर विकल्प से सबसे प्रभावी परिणाम कैसे हासिल किए जा सकते हैं।”
Reuters के अनुसार, नेतन्याहू ने ट्रंप पर तत्काल सैन्य कार्रवाई शुरू करने का दबाव नहीं डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंततः ईरान पर किसी भी कार्रवाई का फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति का ही होगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी हुई चर्चा
बैठक में केवल सैन्य रणनीति ही नहीं, बल्कि संभावित युद्ध के वैश्विक आर्थिक प्रभावों पर भी चिंता जताई गई। Axios के मुताबिक, ट्रंप ने ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता व्यक्त की।
नेतन्याहू ने कहा कि ईरान अब अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने के लिए होर्मुज़ जलडमरूमध्य को अपने अंतिम प्रभावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। उनका मानना था कि दबाव कम करने के बजाय आर्थिक प्रतिबंधों और नाकाबंदी को और मजबूत किया जाना चाहिए।
ईरान के भीतर मतभेदों का दावा
बैठक के दौरान इज़राइली अधिकारियों ने ईरान के अंदरूनी हालात को लेकर भी अपना आकलन साझा किया। उनके अनुसार, ईरानी नेतृत्व दो धड़ों में बंटा हुआ है। एक पक्ष देश की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित है, जबकि दूसरा कट्टरपंथी गुट मानता है कि जब तक सेना पर उसका नियंत्रण बना रहेगा, तब तक सरकार भी सुरक्षित रहेगी।
Axios की रिपोर्ट के अनुसार, एक इज़राइली अधिकारी ने ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई को लेकर दावा किया, “वे जीवित हैं, लेकिन कोई भी निश्चित रूप से यह नहीं कह सकता कि हाल के दिनों में किसी ने उन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखा है। उन्होंने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि उनकी मंजूरी के बिना कोई निर्णय न लिया जाए। एक बार वे इस बात से नाराज़ भी हुए थे कि उनके निर्देशों की अनदेखी की गई।”
सीरिया और तुर्की का मुद्दा भी उठा
बैठक में केवल ईरान ही नहीं, बल्कि सीरिया की स्थिति पर भी चर्चा हुई। खबरों के मुताबिक, नेतन्याहू ने ट्रंप को एक नक्शा दिखाकर सीरिया में इज़राइल और तुर्की की सैन्य मौजूदगी की तुलना की। उनका तर्क था कि सीरिया के बड़े हिस्से पर तुर्की का प्रभाव है, जबकि इज़राइल केवल दक्षिणी क्षेत्र में सुरक्षा कारणों से अपनी मौजूदगी बनाए हुए है।
नेतन्याहू ने ट्रंप से कहा कि जब तक जिहादी संगठनों से खतरा बना रहेगा, तब तक इज़राइल दक्षिणी सीरिया के बफ़र ज़ोन पर अपना नियंत्रण बनाए रखेगा।
एक अधिकारी ने कहा, “नेतन्याहू ट्रंप के सामने वास्तविक स्थिति रखना चाहते थे, क्योंकि कई बार उन्हें अधूरी या गलत जानकारी मिल जाती है। यदि शुरुआत में ही सही तथ्य और दृश्य प्रमाण प्रस्तुत न किए जाएं, तो उनकी राय स्थायी रूप से बन जाती है।”
सऊदी अरब के साथ परमाणु समझौते पर भी चर्चा
बैठक के दौरान अमेरिका और सऊदी अरब के बीच संभावित परमाणु समझौते पर भी बातचीत हुई। ट्रंप ने इस मुद्दे को भविष्य में सऊदी अरब और इज़राइल के बीच संबंधों के सामान्यीकरण से जोड़ते हुए कहा कि दोनों प्रक्रियाएं एक-दूसरे से संबंधित हो सकती हैं।
