पाकिस्तान में फील्ड मार्शल असीम मुनीर के बढ़ते दबदबे के बीच तख्तापलट की अटकलें तेज

Speculation about a coup intensifies amidst the growing clout of Field Marshal Asim Munir in Pakistan.चिरौरी न्यूज

इस्लामाबाद: पाकिस्तान में सत्ता के गलियारों में एक बार फिर सैन्य हस्तक्षेप और संभावित तख्तापलट की चर्चा तेज हो गई है। फील्ड मार्शल असीम मुनीर के हाथों में लगातार बढ़ती शक्तियों और गृह मंत्री मोहसिन नकवी के उस बयान के बाद सवाल उठ रहे हैं, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की शासन व्यवस्था के लगभग “ढह जाने” की बात कही थी।

पाकिस्तान में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अगुवाई वाली निर्वाचित सरकार सत्ता में जरूर है, लेकिन आलोचकों और पाकिस्तान मामलों के जानकारों का दावा है कि विदेश नीति, आंतरिक सुरक्षा, परमाणु कमान और कई अहम प्रशासनिक फैसलों में रावलपिंडी स्थित सैन्य प्रतिष्ठान का प्रभाव लगातार बढ़ा है।

मुनीर के हाथों में बढ़ती ताकत

फील्ड मार्शल असीम मुनीर पाकिस्तान के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में गिने जाते हैं। उनके प्रभाव का दायरा सैन्य मामलों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और आंतरिक प्रशासन तक पहुंचने की बात कही जा रही है।

पाकिस्तान पहले भी कई बार सैन्य शासन देख चुका है। 1958 में अयूब खान, 1977 में जनरल जिया-उल-हक और 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने निर्वाचित सरकारों को हटाकर सीधे सत्ता संभाली थी। 1969 में याह्या खान ने भी अयूब खान से सत्ता अपने हाथ में ले ली थी।

हालांकि इस बार स्थिति अलग बताई जा रही है। विश्लेषकों के मुताबिक पाकिस्तान में एक “हाइब्रिड व्यवस्था” पहले से मौजूद है, जिसमें संविधान, संसद और निर्वाचित सरकार औपचारिक रूप से कायम रहते हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण फैसलों पर सैन्य प्रतिष्ठान का निर्णायक प्रभाव रहता है।

मोहसिन नकवी के बयान ने बढ़ाई हलचल

गृह मंत्री मोहसिन नकवी को असीम मुनीर के करीबी सहयोगियों में माना जाता है। नकवी ने हाल में पाकिस्तान की शासन व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा सिस्टम प्रभावी रूप से “कोलैप्स” हो चुका है और देश अब सामान्य तरीके से नहीं चल सकता।

इस बयान के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक बदलाव की अटकलें तेज हो गईं। हालांकि नकवी ने सीधे तौर पर मार्शल लॉ या सैन्य शासन की घोषणा की मांग नहीं की।

जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने भी नकवी की टिप्पणी पर तंज कसते हुए कहा कि नकवी “वक्त से पहले बालिग हो गए हैं।”

पाकिस्तानी लेखक और Dawn के स्तंभकार यूसुफ नजर ने नकवी के बयान को सैन्य प्रतिष्ठान की सोच से जोड़कर देखा। उनके मुताबिक, अगर शासन व्यवस्था के “ढहने” की बात कही जा रही है, तो इतनी बड़ी शक्ति अपने हाथ में लेने वाले सैन्य नेतृत्व को भी उसके परिणामों की जिम्मेदारी लेनी होगी।

क्या ‘सॉफ्ट कूप’ के बाद आएगा सीधा सैन्य शासन?

पाकिस्तान के इतिहास में सैन्य हस्तक्षेप के दो मॉडल देखने को मिले हैं। पहला मॉडल है सीधा सैन्य तख्तापलट, जिसमें सेना सरकार को हटाकर संविधान को निलंबित कर देती है और मार्शल लॉ लागू करती है। दूसरा मॉडल है सॉफ्ट कूप या हाइब्रिड शासन। इसमें संसद और प्रधानमंत्री बने रहते हैं, चुनाव भी होते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और राजनीतिक व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सैन्य प्रतिष्ठान का प्रभाव निर्णायक रहता है।

पाकिस्तान के मौजूदा हालात को लेकर कुछ विश्लेषक दूसरे मॉडल की ओर इशारा करते हैं। उनका मानना है कि इमरान खान और सैन्य नेतृत्व के बीच टकराव के बाद पाकिस्तान में सेना का राजनीतिक प्रभाव और मजबूत हुआ।

PTI के खिलाफ कार्रवाई, नागरिकों के सैन्य अदालतों में मुकदमे, 2024 के चुनावों के बाद की राजनीतिक स्थिति और PML-N तथा PPP के गठबंधन जैसे घटनाक्रमों ने भी सैन्य प्रतिष्ठान की भूमिका को लेकर बहस तेज की है।

असीम मुनीर के सामने अब अगला कदम क्या?

असीम मुनीर के बारे में यह सवाल उठ रहा है कि अगर सैन्य प्रतिष्ठान पहले से ही देश के प्रमुख फैसलों पर प्रभाव रखता है, तो क्या वह औपचारिक रूप से सत्ता संभालने की दिशा में भी बढ़ सकता है?

पाकिस्तानी सेना के पूर्व अधिकारी और यूट्यूबर आदिल राजा ने दावा किया है कि सैन्य नेतृत्व मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को बदलने की योजना बना रहा है। उनके दावों के मुताबिक असीम मुनीर राष्ट्रपति और मोहसिन नकवी प्रधानमंत्री की भूमिका में आ सकते हैं।

हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें तथ्य के बजाय अपुष्ट राजनीतिक दावों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

इसी तरह कुछ भारतीय और पाकिस्तानी पर्यवेक्षकों ने भी हालिया घटनाक्रम को संभावित राजनीतिक बदलाव का संकेत बताया है। लेकिन अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह निश्चित रूप से कहा जा सके कि पाकिस्तान में मार्शल लॉ या सैन्य तख्तापलट होने वाला है।

संकटों के बीच बढ़ती सैन्य जिम्मेदारी

पाकिस्तान इस समय कई मोर्चों पर संकट से जूझ रहा है। अर्थव्यवस्था पर दबाव, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में असंतोष और अफगानिस्तान सीमा पर तनाव ने सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

ऐसे माहौल में अगर सैन्य नेतृत्व देश के अधिकांश महत्वपूर्ण क्षेत्रों की जिम्मेदारी अपने हाथ में लेता है, तो सफलता का श्रेय भी उसी को मिलेगा। लेकिन अगर हालात बिगड़ते हैं, तो सैन्य प्रतिष्ठान के लिए राजनीतिक जिम्मेदारी से बचना मुश्किल होगा।

यही वजह है कि पाकिस्तान में अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सेना राजनीति में कितनी प्रभावशाली है, बल्कि यह है कि क्या असीम मुनीर पर्दे के पीछे से शासन करते रहेंगे या किसी समय सीधे सत्ता अपने हाथ में लेने का फैसला करेंगे?

फिलहाल इसका कोई निश्चित जवाब नहीं है। लेकिन मोहसिन नकवी के “सिस्टम के ढहने” वाले बयान ने पाकिस्तान में संभावित सैन्य बदलाव की बहस को जरूर एक बार फिर तेज कर दिया है।

 

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