ऑनलाइन परीक्षा के विरोध में छात्रों ने डीयू प्रशासन को लिखी चिठ्ठी

चिरौरी न्यूज़ डेस्क

नई दिल्ली: कोरोना का समय दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए एक और मुसीबत लेकर आया है। ऑनलाइन क्लास के नाम पर खानापूर्ति तो पहले से ही हो रही थी, अब ऑनलाइन एग्जाम कई सारे विद्यार्थियों के लिए तनाव और डिप्रेशन का कारण बन रहा है। ऑनलाइन एग्जाम का विरोध शिक्षक संघ के साथ साथ छात्र-छात्राएं भी कर रहें हैं, लेकिन डीयू प्रशासन इसपर ध्यान देने की बजाय अपनी रूटीन को जैसे तैसे पूरा करना चाह रही है। कुछ छात्रों ने इसी से सम्बंधित एक पत्र डीयू एजुकेशन कौंसिल को लिखी जिसे यहाँ हुबहू संलग्न किया जा रहा है।

महोदय/महोदया

हम, दिल्ली विश्वविद्यालय तृतीय वर्ष के छात्र हैं। कोरोनावायरस के चलते हम सब और हमारे कालेज और यूनिवर्सिटी के बहुत से साथी अत्यधिक परेशान और विचलित है। हमारे कई साथी ऐसे दूसरे जिलों में फंस गए हैं, तो कई अभी तक घर वापस नहीं आ पाए हैं,तो वही कई ऐसे है जिनका घर ही एक कमरे का है जिसमे 6-7 लोग रहते है,तो कई का घर गांवों और पिछड़े इलाकों में है,। कई बच्चों के परिवार वाले किसी दूसरे शहर में फंस गए हैं और कई बच्चों के परिवार वाले जो कहीं दूसरे बाहर शहरों में काम करते थे,वे दोबारा घर लौट कर आए हैं। अब उनके पास काम के लिए कुछ भी नहीं है। कई बच्चों के बड़े भाई-बहन माता-पिता ऐसे बहुत से लोग हैं जो दूसरे शहरों में थे जो अपना काम अपना सब कुछ छोड़ कर दोबारा गांव लौट आए है ,कई बच्चे ऐसे भी हैं जो क्वॉरेंटाइन होम क्वॉरेंटाइन या सरकारी स्कूलों पर 14-14 दिनों के लिए क्वॉरेंटाइन में भी रखे गए हैं,कई लड़कियों ने अपना एक्सपीरियंस साझा करते हुए बताया कि उनको घर को एक काम में भी लगा दिया गया है। अर्थात वह अपने माता-पिता बड़ी बहन इन लोगों के साथ हाथ भी बता रही हैं जिससे उनको पढ़ाई की बिल्कुल फुर्सत नहीं मिलती,कुछ बच्चों को तो करो ना पॉजिटिव भी आ गया है,कई बच्चे ऐसे भी हैं जो इस अवस्था में एक बहुत बड़े मानसिक दबाव से भी गुजर रहे हैं क्योंकि उनकी पढ़ाई हुई नहीं है।

उनके पास पढ़ने के लिए कुछ नहीं है। उनको कुछ पढ़ाया नहीं गया है। ऊपर से यूनिवर्सिटी ने झूठा नोटिफिकेशन निकाला, जिसमें उसने यह दिखाया की 26 मार्च से लेकर 20 मई तक यूनिवर्सिटी ने ऑनलाइन पढ़ाई कराई है बल्कि सभी रिपोर्ट में यह सिद्ध हो चुका है कि उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा कराई गई ऑनलाइन पढ़ाई बिल्कुल अपर्याप्त व प्रभावहीन रही है। हजारों बच्चे उस पढ़ाई का कोई एक्सेस नहीं कर पाए हैं। यहां तक कि सर्वे में यह भी पता चला है कि हजारों बच्चे ऐसे भी हैं जिनके पास कोई नहीं स्टडी मैटेरियल नहीं है। जो बच्चे साधन संपन्न हैं, आर्थिक रूप से सुदृढ़ है वह किसी तरह अपनी पाठ सामग्री , किताबे, नोट्स आदि का इंतजाम कर लेंगे, लेकिन उनका क्या जो साधनहीन हैं, आर्थिक रूप से अक्षम हैं और उनके पास पाठ्य सामग्री की उपलब्धता नहीं है! क्या उनकी जिंदगी इसलिए खराब हो जाए क्योंकि विश्वविद्यालय ने इतना गलत निर्णय ले लिया ?

कई बड़ी आईआईटी संस्थानों और कई विश्वविद्यालयों ने अपनी परीक्षाओं को निरस्त कर दिया, लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी जिसमें हर बैकग्राउंड , हर आर्थिक ,सामाजिक वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं। वह मात्र उन बच्चों के हितों को ध्यान में रख कर अपने फरमान जारी कर रहा है जो साधन सम्पन्न । आराम से हैं वह उन बच्चों की लाखों बच्चों की सोच ही नहीं रहा जो दिल्ली से बाहर के हैं जो अनेक मुसीबतों का अपने घरों पर सामना कर रहे हैं, जिनके पास घर नहीं है जिनके पास कमरे नहीं है जिनके पास पढ़ने की कोई व्यवस्था नहीं है, जिनके पास फोन नहीं है, लैपटॉप नहीं है जिनके पास कुछ भी नहीं है जिससे वह पढ़ाई कर सकें और आप बताइए। अगर इस हालत में बच्चे परीक्षा देते हैं तो उस परीक्षा का क्या नतीजा आएगा। अगर नतीजा आ भी जाता है तो क्या वह बच्चे पास ही कहलाएंगे ?उनके बच्चों की पिछले 5 सेमेस्टर की मेहनत को बर्बाद करने की अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी ठान ली है तो यह बहुत गलत निर्णय है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी जो परीक्षा कराने जा रही है, उसमें मात्र उन बच्चों का फायदा होगा जिनके पास पूरी सुविधाएं हैं ;जैसे प्रिंटर है, कंप्यूटर है। अच्छा नेट है, वाईफाई है और वह उनके घरों में उनके लिए अलग से स्टडी रूम से बने हैं ताकि वह आराम से पढ़ाई कर सकें और पढ़ाई ना भी कर सके तो चीटिंग की व्यवस्था कर सके ताकि वह परीक्षाओं में चीटिंग करके किसी भी तरह से अच्छे नंबर लाकर पास हो जाए ।क्योंकि दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही कई कॉलेजों में जो ऑनलाइन टेस्ट लिए गए थे, उसमें इतनी नकल हुई है कि हर बच्चे के लगभग समान अंक आए हैं। जिन बच्चों के कम भी अंक आते थे, वह भी नकल के माध्यम से अच्छे अंक लाने में सफल हुए हैं। अगर दिल्ली यूनिवर्सिटी इस परीक्षा को परीक्षा कहती है तो इस परीक्षा को लेने का क्या फायदा। इससे अच्छी तो शायद वह परीक्षा होती जिसमें इंटरनल के हिसाब से बच्चों को पचास प्रतिशत अंक दिया जाता ताकि कम से कम उस इंटरनल को देने वाले टीचर को यह तो मालूम होता है कि कौन सा बच्चा कितना पड़ता है? कौन सा बच्चा तेज है ?कौन सा बच्चा नहीं पढता है और कौन सा बच्चा किस हिसाब का है? इसके साथ कोरोनावायरस सभी कि परेशानी का एक कारण बना हुआ है। जिसमें बच्चों की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इस समय हम पढ़ाई कैसे करें सर जिस समय हमारे आसपास इतनी उथल-पुथल मची हो उस समय पढ़ाई कैसे करें ?? यह बहुत बड़ा प्रश्न बन जाता है और ऊपर से जब किसी के पास पुस्तके ना हो ,किसी के पास इंटरनेट ना हो ,तो वहीं किसी के पिताजी की नौकरी जाने का सवाल हो ,कोई दो वक्त का खाना जुटाने में परेशान हो तो सर ऐसी स्थिति में हम पढ़ाई कैसे करें यह बहुत बड़ा सवाल बन जाता है। इस मुश्किल घड़ी में बच्चों के विचलित करने का एक और बड़ा कारण बनी हुई है,हमारी आने वाली परीक्षाएं सभी बच्चों के मन में एक ही भय है कि जिस समय हम परीक्षाओं के लिए पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं और यदि हमारी परीक्षाएं ले ली गई तो हमारा क्या होगा हमारे भविष्य का क्या होगा, हमारे कॉलेज में , विश्वविद्यालय में जब तक लॉक डाउन नहीं था या कोरोना जैसा कोई भी संकट नहीं आया था तब तक ,शिक्षकों के द्वारा लगातार की गई हड़ताल के कारण हमारी पढ़ाई बाधित हुई और कोरोना आने के बाद हमारी कोई भी पढ़ाई नहीं हो पा रही है। क्योंकि हमारी क्लासेज नहीं चल पा रही हैं और जो लाइव क्लासेज और व्हाट्सएप और अन्य माध्यमों से क्लासेज ली जा रही है, उसका एक्सेस बहुत कम विद्यार्थियों तक है या यूं कहें कि वही विद्यार्थी उसका एक्सेस कर पा रहे हैं जो आराम से अपने घरों पर हैं जो हम जैसे विद्यार्थी जो कहीं गांव में रहते हैं तो कहीं दूसरे जिलों में फंसे हैं ऐसे हजारों लाखों विद्यार्थी हैं सर उनकी मुसीबतों को कोई नहीं समझ रहा है.

सर मैं आपका ध्यान इस ओर अवगत कराना चाहता था, सर यदि व्हाट्सएप पर टीचरों के द्वारा पीडीएफ भेजने को पढ़ाई कहते हैं तो मुझे नहीं लगता कि हम पढ़ पाए हैं वास्तविक रूप से ऐसी बहुत सी रिपोर्ट टीचर बनाकर विश्वविद्यालय और एमएचआरडी तक भेज देते हैं कि बच्चों ने पढ़ाई कर ली है परंतु वास्तविकता यह है कि हमारी पढ़ाई बिल्कुल नहीं हो पाई है। हम पूरी तरह से परेशान और विचलित हो चुके हैं।

पिछले सालों में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले कई बच्चे ऐसे है जो इस विकट घड़ी में पढ़ाई नहीं कर पा रहे है और परीक्षा का दबाव उन पर बहुत हावी हो रहा है,क्योंकि वे/हम सब बहुत बड़े मानसिक दबाव से गुजर रहे है,अगर विश्वविद्यालय इस हालत में हमसे परीक्षा लेगा तो बच्चे और पेरेंट्स दोनों बहुत परेशान होंगे। हमें आशंका है कि विश्विद्यालय के इन परीक्षा संबधी निर्णयों की वजह से हमारी ज़िंदगी खराब हो। अगर यूनिवर्सिटी लगातार परीक्षा का दबाव बच्चो पर डालेगा और हमें लगेगा कि हमारे 5 सेमेस्टर की मेहनत यूनिवर्सिटी बर्बाद कर देगी (क्योंकि ऐसे परिस्थिति में आम छात्र पढ़ ही नही सकता। आप स्वयं ही विचार करें क्या इतने सारे दिमागी दबाव में बच्चे परीक्षा दे पाएंगे !)। मजबूरन हमें विश्वविद्यालय के खिलाफ अनसन पर बैठना पड़ेगा।

हम सभी तृतीय वर्ष के छात्र यूनिवर्सिटी से अनुरोध करते हैं कि हमे पिछले सेमेस्टर के रिजल्ट और छठवीं सेमेस्टर के इंटरनल्स के हिसाब से प्रोमोट किया जाए,अगर किसी बच्चे को उसके पिछले 5 सेमेस्टर या पिछले सेमेस्टर के नंबर के हिसाब से और इस बार के इंटरनल के नंबर को जोड़कर प्रमोट किया जाता है तो वह उस बच्चे की असली मेहनत को दिखाएगा,कोई बच्चा पिछले 5 सेमेस्टर में कैसा प्रदर्शन करता आया है,वह कैसा है, उसी हिसाब से वह छटवें सेमेस्टर में भी प्रदर्शन करता। लेकिन अगर हम ऑनलाइन एग्जाम लेते हैं तो उसमें यह होगा कि वह बच्चे जिनके पास पर्याप्त सुविधाएं है जैसे इंटरनेट , स्मार्टफ़ोन,लैपटॉप,पढ़ाई का वातावरण और पढ़ने के लिए स्टडी मटेरियल आदि वह अच्छा परफॉर्मेंस कर देंगे,और वह बच्चे जिनके पास अच्छी फैसिलिटी नहीं है वे अच्छा परफॉर्म नही कर पाएंगे तो यह तो उन बच्चों के साथ अन्याय हो गया, जिनके पास अच्छी फैसेलिटीज नहीं है,और उन बच्चों का नंबर कम आएगा जिनके पास संसाधनों का अभाव है, भले ही वो कितने अच्छे क्यों न हो पढ़ने में।

और जैसा कि दिल्ली विश्वविद्यालय बता रहा है कि वह बच्चे जो ऑनलाइन मोड में परीक्षा नहीं दे पाएंगे, वह सितंबर में दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ऑफलाइन मोड की परीक्षाओं में भाग ले सकते हैं, तो भी वह बच्चे उन बच्चों से पीछे रह जाएंगे, जो ऑनलाइन मोड में परीक्षा देंगे क्योंकि ऑनलाइन मोड में परीक्षा दिए हुए बच्चे मूलता चीटिंग और अन्य अनेक प्रकार की गतिविधियों के द्वारा अच्छे नंबर लाएंगे बल्कि ऑफलाइन मोड में दिए हुए परीक्षा वाले बच्चे उनसे पीछे रह जाएंगे तो यह भी एक तरीके से अन्याय ही है,क्योंकि ऑनलाइन मोड की परीक्षाओं में कोई भी पारदर्शिता नहीं है। इसलिए इनसे उन बच्चों का फायदा होगा,और इसके साथ ही इनका सितंबर अक्टूबर या अनिश्चितकालीन तक का समय बर्बाद हो जाएगा(जब तक स्तिथि सामान्य नही होती)। जिन बच्चों के पास अधिक सुविधाएं हैं अर्थात ऑनलाइन मोड की परीक्षा का अर्थ हुआ। जिसके पास अधिक सुविधा उसके अधिक नंबर।इसके साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय ने अभी बोला है कि सितंबर में वह उन बच्चों की परीक्षाएं कर आएगा जो बच्चे ऑनलाइन परीक्षा नहीं दे सकते, लेकिन अभी ताजा आईसीएमआर के रिपोर्ट के हिसाब से सितंबर में भारत में कोरोना का पीक टाइम होगा। क्या यह संभव है कि सितंबर में दिल्ली विश्वविद्यालय परीक्षा करा पाएगा? दूसरी बात यह क्या दिल्ली विश्वविद्यालय उन सभी बच्चों को जो ऑफलाइन परीक्षा देंगे क्या दिल्ली विश्वविद्यालय में उन बच्चों को गारंटी देगा कि उनका दाखिला किसी भी यूनिवर्सिटी में लेट परीक्षा और लेट परिणामों के कारण नहीं रुकेगा। साथ ही देश या विदेश में किसी भी नौकरी में भी क्या दिल्ली विश्वविद्यालय इस बात की गारंटी देगा कि उनका एडमिशन या सिलेक्शन नही रुकेगा? जो इतने देर में परीक्षा देंगे ऑफलाइन मोड में।साथी जो बच्चे ऑनलाइन मोड में नकल और आदि सुविधाओं के द्वारा अच्छे नंबर ले आएंगे,क्या? दिल्ली विश्वविद्यालय ऑफलाइन मोड में परीक्षा देने वाले बच्चों को यह सुविधा देगा कि वह उनकी मेरिट खराब नहीं होने देंगे या उन बच्चो से ये बच्चे पीछे नही रहेंगे,क्या दिल्ली विश्वविद्यालय सभी ऑनलाइन मोड वाले बच्चो को उनके पिछले सेमेस्टर के नंबर के हिसाब से ही इस बार भी नंबर देगा,ताकि उन बच्चो के साथ अन्याय न हो जो ऑफलाइन मोड में परीक्षा देंगे?

अगर मेरा देश मेरा विश्वविद्यालय और मेरे सभी नेता सांसद और मंत्री गण आज भी अगर मात्र सुविधा भोगियों को ही सुविधा देने पर उतारू है तो मैं इसे देश का दुर्भाग्य समझता हूं और इसे संविधान के साथ सबसे बड़ा धोखा मानता हूं।अब यह दिल्ली विश्वविद्यालय को निर्णय करना है कि वह हजारों लाखों बच्चों के साथ इतना बड़ा अन्याय या डिस्क्रिमिनेशन करना चाहते हैं या फिर पिछले 5 सेमेस्टर या पिछले सेमेस्टर और इस बार के इंटर्नल्स के नंबर के हिसाब से उनको प्रमोट करके उनका भविष्य बचाना चाहते है।

 

प्रार्थी: दिल्ली विश्वविद्यालय के हज़ारों छात्र छात्राएं

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